हरिद्वार की गूंज (24*7)
(इमरान देशभक्त ब्यूरो) रुड़की। रमजान उल मुबारक महीने का आज से तीसरा अशरा शुरू हो चुका है, जो इंसान को अपने गुनाहों से तौबा करने और जहन्नुम से छुटकारा पाने का अशरा है। रमजान के तीन अशरों में पहला अशरा रहमतों का दूसरा मग फिरत का असरा होता है।इस तीसरे और आखरी अशरे में मुसलमान अपने रब से जहां कभी भी गुनाह न करने की तौबा करता है, वहीं इस अशरे में उसकी दुआ भी कबूल होती है। इस अशरे में प्रत्येक मस्जिदों में रोजेदार अयतकाफ की नियत से बैठकर अपनी मगफिरत की दुआ करता है। मदरसा दारुलसस्लाम के कारी शमीम अहमद, डॉ० नैय्यर आजम काजमी, जावेद अख्तर एडवोकेट, अफजल मंगलौरी और हाजी राव शेर मोहम्मद बताते हैं कि रमजान महीने में रोजे का इंसान के दिमाग और उसके शरीर दोनों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। रोजा एक सालाना ट्रेनिंग कोर्स है, जिसका उद्देश्य यह है कि इंसान साल भर मनमानी जिंदगी के बजाय रब चाही जिंदगी गुजारे।रोजा इंसान में अनुशासन पैदा करता है, ताकि इंसान अपनी सोच और कामों को सही दिशा दे सके। इंसान के अंदर गुस्सा, लालच, भूख और काम इच्छाएं जैसी तमाम भावना रहती है, इन सब पर संयम बरतने की सूरत में लाभ और और ना बरतने की सूरत में हानि है।रोजा इंसान को इन सब पर काबू करना सिखाता है अर्थात इंसान को जुर्म और पाप से बचाता है। मौलाना अरशद कासमी, हाजी नौशाद अली, मुहम्मद सलीम खान, हाजी शहजाद अंसारी, कुंवर जावेद इकबाल और मुनव्वर हुसैन बताते हैं कि रोजेदार इंसान जान लेता है कि जब वह खाना-पीना जैसी चीजों को दिन भर के लिए छोड़ सकता है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं तो वह बुरी बातों और बुरी आदतों को भी आसानी से छोड़ सकता है, जो इंसान भूख-प्यास बर्दाश्त कर सकता है वह दूसरी बातें भी सहन कर सकता है, इसलिए कह सकते हैं कि इन तीस दिनों में इंसान में सब्र की ताकत बढ़ जाती है, और साथ ही रोजेदार को मतलब परस्ती और सुस्ती से भी बचाती है, साथ ही रोजा इंसान को अल्लाह का सच्चा शुक्रगुजार बंदा भी बनाता है। रोजा अल्लाह का मार्गदर्शन मिलने पर उसकी तारीफ करने उसका शुक्र अदा करने और परहेजगार बनने के अलावा न केवल इंसान के दिमाग बल्कि उसके शरीर पर भी बड़ा अच्छा प्रभाव डालता है।
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