हरिद्वार की गूंज (24*7)
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| फ़ाइल फ़ोटो |
(गगन शर्मा) हरिद्वार। कोरोना काल मे अभिभावकों और शिक्षण संस्थाओं का विवाद थमने का नाम नही ले रहा है। जहां शिक्षण संस्थाओं का फीस लेने मे तर्क है कि उन्हें अपने स्टाफ का वेतन देना होता है। तो वही अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबन्धन टयूशन फीस के अलावा अन्य फीस भी ट्यूशन फीस में सम्मिलित करके लेने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा देखने को भी मिला है कि जब सरकार और राज्य सरकार ने अन्य फीस लेने पर प्रतिबंध लगाया तो शिक्षण संस्थाओ ने अपनी ट्यूशन फीस को ज्यादा बढ़ा दी है। इसमे जहां राज्य सरकार और हाई कोर्ट स्कूल के पक्ष में ज्यादा ध्यान दे रहा है तो सुप्रीम कोर्ट ने अभिभावकों की समस्या का पक्ष लिया है। लेकिन निराशाजनक बात यह रही कि विभिन्न जनपदों के मुख्य शिक्षा अधिकारीयो और शिक्षा मंत्री ने अभिभावकों और शिक्षण संस्थाओ के इस विवाद को सुलझाने में आवश्यक रुचि लेने से बचते दिखे है। कुछ स्कूल ऐसे भी प्रकाश में आये हैं जिन्होंने अभिभावकों से मार्च 2020 से मार्च 2021 तक फीस तो पूरी ली मगर उन्होंने अपने कई लोग अध्यापको को हटाकर शेष बचे अध्यापको का वेतन भी आधा अधूरा ही दिया। कुछ अभिभावकों का कहना है कि अब शिक्षण संस्थाओ में शिक्षा से ज्यादा पैसा कमाने को प्राथमिकता दी जाती है ऐसे व्यापारियों ने शिक्षा जैसे पवित्र कार्य को बिकाऊ बनाकर रख दिया है और सरकार किन्ही लाभ के कारण ऐसी शिक्षण संस्थाओं पर कोई कार्यवाही करने से बचती है। जिला प्रशासन और राज्य सरकार से अभिभावकों ने फीस के विवाद को सुलझाने में हस्तक्षेप करने की मांग की है।
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