हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। जीवन में कठिनाईयों का बना रहना सरल जीवन को भी जटिल बना देता है। ऐसी स्थिति मे व्यक्ति अपने बौद्विक ज्ञान से उपाय खोजने के अनेक प्रयास करता है। लेकिन जब सफल नही होता है तब ऐसी स्थिति मे उसके सामने दो विकल्प रह जाते है। एक स्थिति से समझौता करते हुए जुझना और दूसरा चुनौती स्वीकार न करके स्वंय को नष्ट करना। आज के स्पर्धात्मक माहौल मे व्यक्ति समझौता न करके स्वयं को नष्ट करने की प्रवृत्ति से ग्रसित है। यही प्रवृत्ति व्यक्ति के पतन का कारण है। इसलिए अध्यात्म को जीवन मे स्थान देकर यथार्थ मे जीवन यापन को सरल बनाने मे मदद मिलती है। आज के दिन श्रीगणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर शुद्व हदय से जब साधक अपने मन के द्वेष मिटाने एवं जीवनपथ की सुगमता को प्राप्त करने के लिए इस व्रत का संकल्प लेता है तो श्रीगणेश सभी कामनाओं को पूरा करके सर्वार्थ सिद्वि प्रदान करते है। इस व्रत का उददेश्य इसी बात की ओर ध्यान आकृष्ट करता है। पौराणिक कथा- एक बार महादेव जी माता पार्वती सहित नर्मदा के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेव जी के साथ चैपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा। हम चैपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा? खेल आरंभ हुआ। दैवयोग से तीनों बार पार्वती जी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेव जी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वती जी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का शाप दे दिया। बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है। मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममता रूपी माँ को उस पर दया आ गई और बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं। एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्री गणेश जी का व्रत किया। तब गणेश जी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ। गणेशजी तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा। तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ। शिवजी ने गणेश व्रत का इतिहास उनसे कह दिया। तब पार्वतीजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया। कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर ब्रह्म-ऋषि होने का वर माँगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। इसी प्रकार तभी से श्री गणेशजी सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। तभी से इस कथा के माहत्म के अनुसार श्रीगणेशजी का चतुर्थी व्रत प्रारम्भ हुआ।



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