हरिद्वार की गूंज (24*7)

(फिरोज अहमद) लक्सर। साल 2020 अब खत्म होने वाला है यह साल कोरोना वायरस और उनकी भयावहता के लिए तो याद किया जाएगा ही लेकिन उसके साथ ही शिक्षा और स्वास्थ सेवा के क्षेत्र में तकनीकी के व्यापक प्रयोग या उनकी वास्तविक स्थिति को उजागर करने के लिए की शुरुआत के लिए भी याद रखा जाएगा। मार्च के महीने से देश में स्कूल बंद हुए थे। और अभी भी सभी स्कूल नहीं खुले हैं। अप्रैल मई के महीने में दुनिया के 183 देशों में स्कूल बंद हुए थे क्योंकि कोरोना के गंभीर खतरे का पूर्वानुमान नहीं था और इस आपदा से जूझने की तैयारी नहीं थी। तो शिक्षा क्रम को जारी रखने के लिए सरकार के द्वारा दिशापोर्टल स्कूल टीवी, व्हाट्सएप और ऑनलाइन माध्यमों की मदद से पढ़ाने की कोशिश हुई शिक्षक छात्र दोनों के लिए अपनी तकनीकी चुनौतियां रही मध्यम और बड़े निजी स्कूल तो अपने छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करने लगे, लेकिन अनेक छोटे स्कूल बंद हो गए और कई जगह निजी स्कूल के अध्यापकों की नौकरी चली गई। बहुमत के परिवार में ऑनलाइन कक्षा के लिए लड़कियों के मुकाबले लड़कों को प्राथमिकता मिली है। परिवार में आर्थिक चुनौती बढ़ने की दशा में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का खतरा और बढ़ गया है। ग्रामीण और शहर दोनों इलाकों में स्कूल 6 महीने तक तो बंद ही रहे जहां शिक्षा कर्म को जारी रखने के लिए डाटा और मोबाइल, लैपटॉप की जरूरत थी वहां बड़ी संख्या में छात्र छात्राओं से अनुपस्थिति रहे। अभिभावकों के सह परिवार शहर से गांव वापसी से भी कुछ छात्रों के स्कूल छूटने का खतरा है। देश में स्कूल स्तर पर नामांकन 97% से अधिक रहा, लेकिन अब कोरोना के कारण स्कूल से बाहर हुए छात्रों की गिनती जरूरी है। इसके लिए एक व्यापक सर्वे की जरूरत होगी।

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