हरिद्वार की गूंज (24*7)
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(फिरोज अहमद) लक्सर। देश में लगभग एक पखवाड़े से जारी किसान आंदोलन भारत के सशक्त लोकतंत्र का बेहतरीन और विपक्ष की ओछी राजनीति का ताजा उदाहरण है। क्योंकि आंदोलन के पहले दिन से ही किसानों की मांगों का जिस प्रकार केंद्र में बहुमत वाली सरकार सम्मान कर रही है उनकी आशंकाओं का समाधान करने का हर संभव प्रयास कर रही है। वह सराहनीय है। यह बात सही है कि मौजूदा सरकार कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष के पिछले चार-पांच सालों के इतिहास को देखते हुए इन कृषि सुधार कानूनों को लाने से पहले ही किसान नेताओं या फिर राज्य सरकारों को विश्वास में लेती तो आज पूरा देश इस अराजक स्थिति और अनावश्यक विरोध की राजनीति से बच जाता। लेकिन या तो सरकार ने इस मामले में दूर की दृष्टि नहीं रखी या फिर उसने विपक्ष की ताकत को कम आंख लिया खैर अब वह स्थिति में अपना नरम और सकारात्मक ग्रुप का परिचय दे रही है। चाहे वह किसानों द्वारा दिल्ली के बुराड़ी मैदान में आंदोलन करने से मना कर देना हो, या किसानों द्वारा सरकार से बिना शरद बात करने की मांग करना हो चाहे कृषि मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक विभिन्न स्तरों पर किसान नेताओं की बैठकों का दौर हो, और या फिर अपने ताजा कदम में आखिर किसानों की मांग को देखते हुए सरकार द्वारा कृषि कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव किसानों के पास भेजना हो, सरकार अपने हर कदम से बातचीत करके किसानों की समस्याओं को दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता अपने नियत और मनसा स्पष्ट कर रही है। वहीं दूसरी तरफ किसान संगठनों का रवैया किसान नेताओं की मंशा और विश्वसनीयता दोनों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। क्योंकि इन कानूनों के जिन मुद्दों को उठाकर यह किसान आंदोलन खड़ा किया गया है सरकार उन सभी पर संशोधन करने के लिए तैयार है बावजूद इसके किसान नेता संशोधन को मानने की बजाय कानून वापस लेने की अपनी मांग पर ही अड़े हैं। लेकिन किसान नेताओं द्वारा सरकार के इस संशोधित प्रस्ताव को ठुकरा ना और संशोधन नहीं केवल कानून वापस लेने की मांग पर आ जाना सरकार के साथ बैठकों में कानून पर बात करने के बजाय यस और नो, हां या ना के प्लेकार्ड लहराना या फिर सरकार द्वारा संशोधन भेजने के बावजूद आंदोलन और तेज करने की घोषणा करना, जिसमें अदानी अंबानी के सामान का बहिष्कार करना जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इस आंदोलन में किसानों के पीछे छुपे असली चेहरों को बेनकाब कर रहे हैं क्योंकि इससे पहले भी जब सरकार के साथ 9 तारीख को बैठक प्रस्तावित थी तब किसान संगठनों द्वारा 8 तारीख को भारत बंद का आह्वान इस बंद को समूचे विपक्षी दलों का समर्थन और राहुल गांधी, शरद पवार समेत विपक्षी दलों के एक प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति से मिलकर इन कानूनों को रद्द करने की मांग करने यह सब भी बातें अपने आप में इसके पीछे की राजनीति को उजागर कर रही है। खास बात यह है कि इस आंदोलन में रहने खाने से जुड़े मूलभूत विषय हो या सरकार से बातचीत करने की रणनीति तैयार करने जैसे गंभीर विषय हो या जिस प्रकार की खबरें सामने आ रही है या फिर प्रसाद के रूप में काजू किसमिस बांटने जैसी वीडियो सामने आ रही है वह इस आंदोलन को शाहीन बाग जैसे आंदोलन के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं आंदोलन स्थल पर रोटी बनाने की मशीनें हाईवे पर जगह-जगह लगी वाशिंग मशीन ए ट्यूब वाटर पंप का संचालन करने वाली मोबाइल 16 अंकों मोबाइल फोन चार्ज करने और बैटरी बैंक के रूप में तब्दील करना बिजली के लिए सोलर पैनल और इनवर्टर का प्रयोग अगर हमारे किसानों ने एक हाईवे की सड़क पर अपने दम पर यह इंफ्रास्ट्रकर खड़ा किया है तो इसका मतलब यह है कि हमारे किसान हर प्रकार से समक्ष हैं और आधुनिक तकनीकी का प्रयोग भी बखूबी जानते हैं तो फिर यह अपने इस हुनर का प्रयोग आंदोलन के बजाय खेती और फसल को उन्नत करने में लगाते तो वह खुद भी आगे जाते और देश की तरक्की में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते लेकिन हमारे देश के किसानों की हकीकत किसी से छुपी नहीं देश के 86% किसान छोटे किसान हैं जो खुद खेती में निवेश भी नहीं कर सकते किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं के आंकड़े उनकी दयनीय स्थिति बताने के लिए काफी है इसलिए जब इस किसान आंदोलन के जरिए हमारे देश के किसानों की यह विरोधाभास आ तस्वीरें सामने आती है तो इनसे राजनीति की बू आती है जब केजरीवाल एक तरफ दिल्ली में इनकी ऋषि बिलों में से एक को लागू करते हैं और दूसरी तरफ किसानों के बीच जाकर इन कानूनों के विरोध में खड़े हो जाते हैं या जब राहुल गांधी किसानों से कानून वापस लेने तथा पीछे नहीं हटने का आह्वान करते हैं लेकिन अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन्हीं कृषि सुधारों को लागू करने का वादा करते हैं या जब शरद पवार आज इन कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन का समर्थन करते हैं लेकिन खुद कृषि मंत्री रहते हुए राज्य के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर इन कृषि सुधारों को लागू करने की वकालत करते हैं लेकिन राजनीति से इतर यह बात भी सही है कि सरकार द्वारा लाए इन कृषि सुधार कानूनों में छोटे किसानों के मद्देनजर और सुधार की गुंजाइश हो सकती है और किसान संगठन का मुख्य उद्देश्य इन छोटे किसानों के हित की रक्षा करना होता है। इसीलिए किसान नेताओं का दायित्व है कि वह विपक्ष के हाथों अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने से बचाएं और देश के लोकतंत्र का सम्मान करते हुए सरकार से बातचीत कर आम किसानों के हितों की रक्षा की पहल करें ना की रियल लुक का परिचय दें क्योंकि समझने वाली बात यह है कि विपक्ष की इस राजनीति में दांव पर विपक्ष नहीं बल्कि किसानों का भविष्य लगा है।
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