हरिद्वार की गूंज (24*7)
हरितालिका तीज (गौरा तीज) पर विशेष: डाॅ: शिवकुमार चौहान
(रजत चौहान) हरिद्वार। भारत की संस्कृति सदैव सर्वधर्म सम्भाव की पक्षधर रही है। भारत की धरती पर अनेक धर्म सम्प्रदायों को मानने वाले लोग रहते है। लेकिन सनातन धर्म से जुडे लोगों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। सनातन धर्म मे महिलाओं को शक्ति स्वरूपा, सौभाग्य एवं समृद्वि की देवी कहाॅ गया है। ‘यत्र नारीस्य पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। यह भाव इस बात की पुष्टि करता है कि जहां नारी का सम्मान होता है ऐसे स्थानों पर व्यक्ति को देवताओं की सन्निध सुगमता से प्राप्त हो जाती है। देश भर मे अनेक स्थानों पर हरितालिका तीज पर्व उत्साह से मनाया जाता है। इस त्यौहार पर महिलाएं शक्तिस्वरूपा माता पार्वती के गौरी रूप तथा भगवान शंकर की पूजा अर्चना करती है। आज के दिन सुहागन महिलाएं सुबह स्नान आदि नित्य कर्म करने के उपरान्त निर्जला उपवास का संकल्प लेकर पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती है और दिनभर भगवान शिव व माता गौरी के चरित्र की गाथाओं को सुनती है। हरितालिका तीज की कथा को भगवान शंकर ने देवी पार्वती को उनका पूर्व जन्म याद दिलाने के लिए सुनाया था। देवी पार्वती बाल्यावस्था से ही भगवान शंकर को अपना पति मान चुकी थी। भगवान शंकर को पति रूप मे पाने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की। हरतालिका व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार, पार्वती जी के पिता को शिवजी का रहन-सहन और उनकी वेशभूषा बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसी समय नारद जी राजा दक्ष के पास आए और उन्होंने राजा के सामने विष्णु जी और पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव रखा। पार्वती जी के पिता इस विवाह के लिए तुरंत मान गए। लेकिन माता पार्वती मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं। विष्णु जी से उन्होने विवाह करने से मना कर दिया। तब माता पार्वती जंगल मे तप करने की माता-पिता से आज्ञा लेकर अपनी सखियो के साथ जंगल मे चली गई। जंगल में शिव को पति के रूप में पाने के लिए पार्वती जी ने कठोर तपस्या की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और माता पार्वती के वर मांगने पर उन्होंने पार्वती जी को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। आखिर में उनके पिता भी इस विवाह के लिए मान गए। इस व्रत का संकल्प हमे यह शिक्षा प्रदान करता है कि शुद्व हदय एवं सच्चे मन से धारण किया गया संकल्प अवश्य भलीभूत होता है। यह शास्त्र सम्मत है।
यह हरतालिका तीज सावन की हरियाली तीज से अलग है। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शंकर का पूजन और आरती प्रत्येक पहर में होती है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को सिंदूर, मेहंदी, बिंदी, चूड़ी, काजल आदि भेंट स्वरूप देने से मनोवांच्छित कामना पूर्ण होती है।



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