हरिद्वार की गूंज
(गगन शर्मा) हरिद्वार। एक चेहरे पे आवश्यकतानुरूप चेहरे लगा लेते हैं लोग। कुछ ऐसा ही उत्तराखंड में यहाँ के जिम्मेदार नेता कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राष्ट्रीय राजमार्ग से शराब के ठेके 500 मीटर दूर होने चाहिए तो क्या करते कुछ दिन ठेके बन्द करके उस आदेश को कैसे बदले? खोज हुई तो उनके किसी धुरंधर सलाहकार ने सलाह दी कि क्यो न राष्ट्रीय राजमार्ग को कुछ जगह राज्य राजमार्ग कहकर कुछ आदेश की काट निकाली जाय। फिर वही हुवा हरिद्वार के जगजीतपुर में पहले भी शराब का ठेका मुख्य राजमार्ग से मात्र 30 मीटर था और अब भी 30 मीटर ही है। पहले स्कूलों से अलग था अब अस्पतालों और स्कूल जोन के बीच मे ही खोल दिया गया। जिसका अध्यात्म और शिक्षा से सम्बंधित लोगो ने पुर जोर विरोध किया मगर हासिल कुछ नही हुवा। उसके बाद राज्य के हाई कोर्ट ने होमगार्ड के पक्ष में निर्णय दिया कि होमगार्ड्स को भी पुलिस कर्मियों की भांति सुविधाये मिले तो वहाँ भी राज्य सरकार ने अदालत के निर्णय से बचने के रास्ते निकाल लिये। हाल ही मैं उत्तराखंड हाई कोर्ट ने निर्णय दिया कि पुलिस कर्मी 8 घण्टे से ज्यादा ड्यूटी पर तैनात न रहे, तो इसकी भी विभाग और राज्य सरकार द्वारा काट ढूंढी गयी। मामला कांग्रेस और भाजपा के बीच तो तब फंसा जब एक सरकार ने गंगा नदी को नहर में इसलिए उच्चारण दिया गया क्योंकि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कुछ माह पहले निर्णय दिया था कि गंगा किनारे 200 मीटर तक कोई भवन निर्माण नही होगा। इस पर धार्मिक लोगो को ऐतराज हुवा कि गंगा नदी जिसे सभी हिन्दू श्रद्धा से गंगा मैया पुकारते हैं उसे स्वार्थवश "नहर" कहकर पुकारना कैसे स्वीकार किया जाय। जैसे कुछ डिजानर पत्रकर किसी भी खबर को छापने या छिपाने से पहले सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किस किस खबर को स्वयं का फायदा किस में है? छिपाने में या छापने में! उसी प्रकार उत्तराखंड यदि अस्तित्व में आने के 18 साल बाद भी पर्याप्त उन्नति नही कर पाया तो उसकी वजह यहां के वो नेता हैं जो चाहते तो हरिद्वार देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग का 4 साल से अटका काम समय से पूरा हो जाता, यदि मंत्री/ सांसद चाहते तो गंगा में एक भी गन्दा नाला न गिरता। यदि सत्ता पक्ष के नेता चाहते तो हरिद्वार स्वछता अभियान में पहले नम्बर पर आता। यदि यहाँ के सांसद, मंत्री चाहते तो यात्री सीजन आने से पहले चीला ऋषिकेश बाय पास रोड 8 - 8 इंच गड्ढो से मुक्त हो सकता था। यहाँ के युवाओं को रोजगार मेले से निराश न लौटना पड़ता। मगर हो सकता है कि उनका उद्देश्य राजनीति में आना उत्तराखंड का विकास न होकर स्वयं का विकास प्राथमिकता में हो। अन्यथा वो हाईकोर्ट के निर्णयों के शब्दों से ऐसे न खेलते।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। एक चेहरे पे आवश्यकतानुरूप चेहरे लगा लेते हैं लोग। कुछ ऐसा ही उत्तराखंड में यहाँ के जिम्मेदार नेता कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राष्ट्रीय राजमार्ग से शराब के ठेके 500 मीटर दूर होने चाहिए तो क्या करते कुछ दिन ठेके बन्द करके उस आदेश को कैसे बदले? खोज हुई तो उनके किसी धुरंधर सलाहकार ने सलाह दी कि क्यो न राष्ट्रीय राजमार्ग को कुछ जगह राज्य राजमार्ग कहकर कुछ आदेश की काट निकाली जाय। फिर वही हुवा हरिद्वार के जगजीतपुर में पहले भी शराब का ठेका मुख्य राजमार्ग से मात्र 30 मीटर था और अब भी 30 मीटर ही है। पहले स्कूलों से अलग था अब अस्पतालों और स्कूल जोन के बीच मे ही खोल दिया गया। जिसका अध्यात्म और शिक्षा से सम्बंधित लोगो ने पुर जोर विरोध किया मगर हासिल कुछ नही हुवा। उसके बाद राज्य के हाई कोर्ट ने होमगार्ड के पक्ष में निर्णय दिया कि होमगार्ड्स को भी पुलिस कर्मियों की भांति सुविधाये मिले तो वहाँ भी राज्य सरकार ने अदालत के निर्णय से बचने के रास्ते निकाल लिये। हाल ही मैं उत्तराखंड हाई कोर्ट ने निर्णय दिया कि पुलिस कर्मी 8 घण्टे से ज्यादा ड्यूटी पर तैनात न रहे, तो इसकी भी विभाग और राज्य सरकार द्वारा काट ढूंढी गयी। मामला कांग्रेस और भाजपा के बीच तो तब फंसा जब एक सरकार ने गंगा नदी को नहर में इसलिए उच्चारण दिया गया क्योंकि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कुछ माह पहले निर्णय दिया था कि गंगा किनारे 200 मीटर तक कोई भवन निर्माण नही होगा। इस पर धार्मिक लोगो को ऐतराज हुवा कि गंगा नदी जिसे सभी हिन्दू श्रद्धा से गंगा मैया पुकारते हैं उसे स्वार्थवश "नहर" कहकर पुकारना कैसे स्वीकार किया जाय। जैसे कुछ डिजानर पत्रकर किसी भी खबर को छापने या छिपाने से पहले सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किस किस खबर को स्वयं का फायदा किस में है? छिपाने में या छापने में! उसी प्रकार उत्तराखंड यदि अस्तित्व में आने के 18 साल बाद भी पर्याप्त उन्नति नही कर पाया तो उसकी वजह यहां के वो नेता हैं जो चाहते तो हरिद्वार देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग का 4 साल से अटका काम समय से पूरा हो जाता, यदि मंत्री/ सांसद चाहते तो गंगा में एक भी गन्दा नाला न गिरता। यदि सत्ता पक्ष के नेता चाहते तो हरिद्वार स्वछता अभियान में पहले नम्बर पर आता। यदि यहाँ के सांसद, मंत्री चाहते तो यात्री सीजन आने से पहले चीला ऋषिकेश बाय पास रोड 8 - 8 इंच गड्ढो से मुक्त हो सकता था। यहाँ के युवाओं को रोजगार मेले से निराश न लौटना पड़ता। मगर हो सकता है कि उनका उद्देश्य राजनीति में आना उत्तराखंड का विकास न होकर स्वयं का विकास प्राथमिकता में हो। अन्यथा वो हाईकोर्ट के निर्णयों के शब्दों से ऐसे न खेलते।



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