हरिद्वार की गूंज (24*7)

(गगन शर्मा) हरिद्वार। हरिद्वार कुंम्भ मेले से पूर्व सिंहद्वार हाई वे और रायवाला जंगल का फ्लाई ओवर कई वर्षों तक अटका रहा था। यहां तक कि सिंहद्वार वाले फ्लाई ओवर के कुछ हिस्से को तकनीकी खराबी के चलते पुनः तैयार करना पड़ा था। माना कि पुनः तैयार करने में और बनाने वाली कंपनी को बदलने में सरकार का काफी पैसा अनावश्यक बजट से ज्यादा भी लगा मगर कहते हैं कि अंत भला तो सब भला दबाव भले ही कुंम्भ मेले का रहा हो मगर अधिकांश फ्लाई ओवर तैयार होकर उन पर वाहन चलने से लोकल जनता को लाभ भी मिल रहा है। बस ऐसा ही कुछ हाल गंगा प्रदूषण निगम द्वारा बनाये गए नाले का हो रहा है। नाबार्ड द्वारा वित्तीय लाभ से तैयार हुवे जगजीतपुर से रानीमाजरा गांव के किसानों के हित मे बना यह नाला इतना पैसा लगने के बाद भी अधर में लटक गया है। सम्बंधित विभाग के एक उच्च अधिकारी का कहना है कि  ठेकेदार और विभाग के एक अभियंता द्वारा तय मानक से अलग कार्य होने के कारण नाला कई जगहों से क्षतिग्रस्त हो चुका है। जिसके कारण बजट से अधिक कार्य हुवा, कमेटी ने इसकी जाँच कराकर हाल ही में विभाग को दी है। लगभग 23 करोड़ की लागत से ग्रामीण क्षेत्र में कुछ समय पूर्व नमामि गंगे के तहत मां गंगा स्वच्छ अभियान का शुभारंभ हुआ था। जिसमें जगजीतपुर से लेकर रानी माजरा तक नाबार्ड के सौजन्य से 23 करोड रुपए की लागत लगाकर एक नाला निर्माण का कार्य हुआ था जिसके पानी से किसानों को खेती में सिंचाई होनी थी। क्षेत्र के किसानों में से राजबीर चौहान का कहना है कि यह नाला कई जगह से क्षतिग्रस्त हो रखा है। कटारपुर के ग्राम प्रधान ने देखा कि जगजीतपुर और मिस्सरपुर के बीच गंगा किनारे हाल ही में बनाये गए नाले का गंदा पानी पवित्र गंगा नदी में मिल रहा है। जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई। किसानों के कहना है कि जिस उद्देश्य के लिए इस नाले का निर्माण किया गया था वह पूरा नहीं हुआ है क्योंकि मां गंगा स्वच्छ अभियान के तहत इतनी मोटी रकम लगाकर नाले का निर्माण हुआ और अभी इस नाले में पानी चला भी नहीं यह नाला जगह-जगह से टूट गया है। अर्थात नाले बनाते समय गुणवत्ता का ख्याल नही रखा गया। बताया जा रहा है कि इस नाले का उद्देश्य मां गंगा को स्वच्छ करने का तो था, साथ ही जिस क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है उस क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना था। लेकिन अफसोस नाबार्ड बैंक से मिले बजट का उचित सही इस्तेमाल नही हो पाया। क्योकि शहर से जो पानी गंगा प्रदूषण ट्रीटमेंट प्लांट पर आता है वहां पर  एक बड़ी मशीन लगाई गई जिससे शहर से आने वाले पानी को फिल्टर कर कर किसानों को सिंचाई के लिए देना था और मां गंगे को दूषित होने से बचाना था। ग्रामीणों का आरोप है कि आज भी स्थिति जस की तस है। जैसे मां गंगे में पहले गंदा पानी छोड़ा जाता था आज भी वही हाल है। ट्रीटमेंट प्लांट से वह पानी मां गंगा में ही जा रहा है नाले के बनने का कोई भी लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है और ना ही मां गंगे स्वच्छ हो रही है जिसको लेकर क्षेत्र के लोगों में बढ़ा आक्रोश है। क्योंकि नाला निर्माण के समय में लोगों की भूमि भी नाली निर्माण में गई थी जिसका सरकार के द्वारा मुआवजा भी दिया गया। किसानों को एक आस लगी थी कि अब उन्हें पानी की कोई भी समस्या नहीं रहेगी क्योंकि गर्मियों के दिनों में खेतों के नलकूप सूख जाते हैं, जिस वजह से किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती है। किसानों को उम्मीद थी कि अब उनकी फसलें पानी के कारण खराब नही होगी। लेकिन यह नाला निर्माण सिर्फ और सिर्फ हवा हवाई होकर इसका कोई भी लाभ ग्रामीण इलाके को नहीं मिल पा रहा है। साथ ही जो किसान गंगा के किनारे अपने खेतों में कार्य करते हैं वह गंगा जी से ही पानी पीते थे अब उन्हें गंदा पानी पीकर स्वास्थ्य खराब होने की संभावना है। किसानों की मांग है कि इसके लिये सरकार को जिसे जो सजा देनी है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि राज्य सरकार या केंद्र सरकार किसानों के हितों को देखते हुवे गंगा को प्रदूषित होने से बचाने और किसानों को सिंचाई हेतु पानी मिलने के लिये यह नाला पुनः बनवाये।

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