हरिद्वार की गूंज (24*7)
(यतेंद्र कुमार) हरिद्वार। मानव अधिकार संरक्षण समिति के राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री हेमन्त सिंह नेगी ने दशहरे के अवसर पर जानकारी देते हुए कहा कि नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजयादशमी का त्योहार मनाया जाता है, जिसे दशहरा कहते हैं। इस दिन परंपरा अनुसार रावण के पुतले का दहन कर, असत्य पर सत्य की विजय का पर्व मनाया जाता है। हमारी संस्कृति में भले ही रावण को खलनायक के रूप में देखा जाता हो, लेकिन हमारे ही देश में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां रावण का दहन नहीं बल्कि उसका पूजन किया जाता है।
बिसरख: उत्तरप्रदेश में ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव के बारे में मान्यता है कि यहीं रावण का जन्म हुआ था। यहां उनके पिता ऋषि विश्रवा का आश्रम था और उन्हीं के नाम पर इस गांव का नाम पहले विश्वेशरा पड़ा था और अब इसे बिसरख के नाम से जाना जाता है। जहां ऋषि विश्रवा का आश्रम था वहां वर्तमान में अष्टभुजीय शिवलिंग है। इसकी स्थापना स्वयं रावण ने की थी। बिसरख में रावण पूजनीय है यही वजह है यहां विजयादशमी के दिन रावण दहन नहीं किया जाता।
कानपुर: विजयादशमी के त्योहार पर यूं तो प्रभु श्रीराम की आरती उतारी जाती है, लेकिन यूपी में एक ऐसा मंदिर है जहां रावण को पूजा जाता है। यह मंदिर कानपुर के शिवाला रोड पर स्थित है। खास बात यह है कि मंदिर सिर्फ दशहरे वाले दिन ही खोला जाता है और रावण दहन के बाद इसे बंद कर दिया जाता है।
विदिशा: मध्य प्रदेश के विदिशा शहर में रावणग्राम दशानन की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। विदिशा के रावणग्राम में रावण का एक मंदिर है और यहां रावण की दस फुट लंबी प्रतिमा भी है। दशहरा के दिन यहां रावण की पूजा की जाती है। इस दिन रावण की नाभि में रूई से तेल लगाया जाता है। माान्यता है कि ऐसा करने से रावण के नाभि में जो तीर लगा था उसका दर्द कम होगा और रावण गांव में खुशहाली लाएंंगे।
चिखली: महाकाल की नगरी उज्जैन के पास एक गांव है चिखली। यहां भी रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। यहां के बारे में कहा जाता है, कि रावण की पूजा नहीं करने पर गांव जलकर राख हो जाएगा। इसी डर से ग्रामीण यहां रावण दहन नहीं करते और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं।
मंदसौर: मध्यप्रदेश के मंदसौर में भी रावण को पूजने की परंपरा है। मंदसौर का असली नाम दशपुर था, और माना जाता है यह रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का मायका था। इसलिए इस शहर का नाम मंदसौर पड़ा। चूंकि मंदसौर रावण का ससुराल था, और यहां की बेटी रावण से ब्याही गई थी, इसलिए यहां दामाद के सम्मान की परंपरा के कारण रावण के पुतले का दहन करने की बजाय उसे पूजा जाता है।
जोधपुर: राजस्थान में जोधपुर के चांदपोल क्षेत्र में भी रावण का मंदिर और उसकी मूर्ति स्थापित है। कुछ समाज विशेष के लोग यहां पर रावण का पूजन करते हैं और खुद को रावण का वंशज मानते हैं। मान्यता है कि यहीं रावण और मंदोदरी का विवाह हुआ था। आज भी रावण की चवरी नामक एक छतरी मौजूद है। शहर में रावण का मंदिर बनाया गया है।
बैजनाथ: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में बैजनाथ कस्बा है। यहां बिनवा पुल के पास रावण का मंदिर है। इस मंदिर में एक शिवलिंग है और उसी के पास एक बड़े पैर का निशान है। बताया जाता है यहां रावण ने एक पैर पर खड़े होकर भगवान शिव की तपस्या तपस्या कर मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था। इस शिव मंदिर के पूर्वी द्वार में खुदाई के दौरान एक हवन कुंड भी निकला था। मान्यता है कि इसी कुंड में रावण ने हवन कर अपने नौ सिरों की आहुति दी थी। माना जाता है कि इस क्षेत्र में रावण का पुतला जलाया गया तो उसकी मौत निश्चित है।
काकिनाड: पौराणिक कथाओं और किवदंतियों के अनुसार रावण ने आंध्र प्रदेश के काकिनाड में एक शिवलिंग की स्थापना की थी। वहां इसी शिवलिंग के निकट रावण की भी प्रतिमा स्थापित है। यहां का मछुआरा समुदाय शिव और रावण दोनों की पूजा करता है।



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