हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। एक ओर आज गोपाष्टमी मनाई जा रही है तो दूसरी ओर हिन्दू धर्म के ही काफी लोग जिन्हें प्रभु के आर्शीवाद से पद, प्रतिष्ठा, मान सम्मान, धन सभी कुछ मिला है नही मिला तो गाय माता के हित मे कुछ करने का जज्बा। पूरे भारत देश मे ऐसे बहुत से राज्य है जहाँ की सरकार चाहती तो एक भी गाय को सड़क पर भोजन और उपचार हेतु दर दर भटकना न पड़ता। तीर्थस्थल हरिद्वार और ऋषिकेश में चप्पे चप्पे पर गाय सड़को पर घूमती मिल जायेगी। हरिद्वार में जगजीतपुर नगर निगम क्षेत्र में पेट्रोल पंप के पास सुबह ही सुबह काफी गाय कूड़े में अपना पेट भरती दिखाई दे जायेगी। कुछ लोगो के लिये ये सामान्य बात है मगर विपिन प्रधान के छोटे सुपुत्र को ये गवांरा न हुवा उन्होंने अपने खर्चे पर वहाँ की गाय और अन्य पशुओ हेतु पीने के पानी की और घास की व्यवस्था की। इसके लिये वो प्रतिदिन दुकान से घास लाकर एक बर्तन में डालते हैं। जतिन प्रधान ने बताया कि एक दिन कूड़े में से किसी गाय ने जो भोजन या घास खाया उसमे कांच होने के कारण वो गाय वहीं तड़फ तड़फ कर स्वर्गलोक को चली गयी। फिर जतिन ने फावड़े से मिट्टी खोदकर उसको वही अंतिम संस्कार किया। एक ओर तो हरिद्वार के कुछ महामंडलेश्वर गाय और सनातन धर्म के उपदेश देते देते आज बहुत बड़ी उपाधि पर आसीन है वो चाहे तो हरिद्वार ही नही अपितु पूरे भारत देश की गाय को उचित सम्मान दे। मगर ऐसा लगता है कि आज उनकी आवश्यकता पैसे और पद प्रतिष्ठा तक ही सीमित रह गयी हैं। जबकि विद्वानों का मानना है कि गाय में होती है सूर्यकेतु नाड़ी,जो सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती है, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी पर्व मनाया जाता है। वहीं गाय के सींगों का आकार पिरामिड की तरह होने के कारणों पर भी शोध करने पर पाया कि गाय के सींग शक्तिशाली एंटीना की तरह काम करते हैं और इनकी मदद से गाय सभी आकाशीय ऊर्जाओं को संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गौमूत्र, दूध और गोबर के द्वारा प्राप्त होती है। इसके अलावा गाय की कूबड़ ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। इसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है। इसलिए गाय का दूध हल्का पीला होता है। यह पीलापन कैरोटीन तत्व के कारण होता है। जिससे कैंसर और अन्य बीमारियों से बचा जा सकता है। गाय की बनावट और गाय में पाए जाने वाले तत्वों के प्रभाव से सकारात्मक ऊर्जा निकलती है। जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और मानसिक शांति मिलती है।
भविष्य पुराण में गाय महिमा
भविष्य पुराण के अनुसार गाय को माता यानी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। गौमाता के पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं।
गोपाष्टमी की परंपराएं
गाय और बछड़े को सुबह नहलाकर तैयार किया जाता है। उसका श्रृंगार किया जाता हैं, पैरों में घुंघरू बांधे जाते हैं, अन्य आभूषण पहनाएं जाते हैं। गौ माता के सींगो पर चुनड़ी का पट्टा बाधा जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करके गाय के चरण स्पर्श किए जाते हैं।
गाय की परिक्रमा की जाती हैं। इसके बाद उन्हें चराने बाहर ले जाते है। इस दिन ग्वालों को भी दान दिया जाता हैं। कई लोग ग्वालों को नए कपड़े देकर तिलक लगाते हैं। शाम को जब गाय घर लौटती है, तब फिर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें अच्छा भोजन दिया जाता है। खासतौर पर इस दिन गाय को हरा चारा, हरा मटर एवं गुड़ खिलाया जाता हैं। जिनके घरों में गाय नहीं होती है वे लोग गौ शाला जाकर गाय की पूजा करते है, उन्हें गंगा जल, फूल चढाते है, दीपकल लगाकर गुड़ खिलाते है। गौशाला में भोजन और अन्य समान का दान भी करते है। औरतें कृष्ण जी की भी पूजा करती है, गाय को तिलक लगाती है। इस दिन भजन किये जाते हैं। कृष्ण पूजा भी की जाती हैं। समाज और देश के सम्मानित नेताओ, मंत्रियों, महामंडलेश्वर, अखाड़ों को चाहिए कि वो जतिन प्रधान जैसे युवाओ से प्रेरणा लेकर पूजनीय गाय माता के कल्याण हेतु आवश्यक कदम उठाये।



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