हरिद्वार की गूंज (24*7)

(शिवाकांत पाठक) कविता। जब जब आतंकी हमलों की ज्वाला दिल में जलती है!!

तब तब कलम हमारी फिर, कागज पर आग उगलती है!!

अंतर्मन तो कहता है कि लिख डालूँ मैं भी श्रंगार!!

रक्त देख कर अमर शहीदों का लिख जाता है अंगार!!

बदला लेने की खातिर अब कलम हमारी चलती है!!

तब तब कलम हमारी फिर कागज पर आग उगलती है!!

तभी शहादत होती है जब जब आतंकी आते हैं!!

अपनी ही सेना पर नेता उंगली रोज उठाते हैं!!

आतंकी जहरीली नागिन राजनीति से पलती है!!

तब तब कलम हमारी फिर कागज पर आग उगलती है!!

लिखा हुआ है रामायण में भय बिन प्रीति नहीं होती!!

 इसीलिए तो बिना युद्ध के अपनी जीत नहीं होती!!

 राजनीति इतना कुछ खोकर हाथों को क्यों मलती है!!

 तब तब कलम हमारी फिर कागज पर आग उगलती है!!

अमर शहीदो को राष्ट्रहित में समर्पित कविता!!
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