हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। पुलवामा में हुई आतंकी घटना को सुनकर आज सम्पूर्ण देश संगठित होकर घटना का विरोध कर रहा है, एकजुटता वह भी संकट की घड़ी में होना बेहद महत्वपूर्ण होती है, परन्तु यह कायराना हमला है आमने सामने के युद्ध में यदि हमारे सैनिक शहीद होते तो नजारा कुछ और होता अब सोचने की बात है 300 किलो ग्राम विस्फोट सामग्री लेकर आने वाली गाड़ी की चेकिंग हुई थी या नहीं और चेकिंग यदि हुई तो फिर तीन सौ किलो विस्फोट बचा कैसे इस बात पर एक संदेह होता है कि हमारी आन्तरिक सुरक्षा में कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है या गद्दारी इस बात की जाँच होना आवस्यक है, हमारे जवान यदि लड़ते हुये शहीद तो वे वीर अब्दुल हमीद की तरह पराक्रम दिखाते हुए शहीद होते भारतीय इतिहास में पराक्रमी वीरो की गाथा कम नहीं हैं वीर हनुमान जी की बुध्दि व पराक्रम सभी जानते हैं दूसरे देश निर्भीकता के साथ जाकर उसके गोपनीय स्थानों तक पहुंचने व नष्ट करने में पारांगत हनुमान जी की गौरव गाथा हमारे देश को गौरवान्वित करती है, वह स्थित कितनी भयावह होगी जब लंका नगरी में हनुमान जी को रावण के सम्मुख उपस्थिति किया गया और उसे पता चला कि वह राम की गुप्तचर (दूत) है व सीता का पता लगाने अशोक वाटिका जैसे अति गोपनीय स्थान में पहुँच गया है और हनुमान भी यही चाहते थे कि रावण को बता दिया जाय कि उन्हे माँ सीता का पता चल चुका है अब लंका पर आक्रमण होगा लेकिन रावण इससे भयभीत नहीं हुआ उसे क्रोध अवस्य आया था कि एक अकेला विदेशी ब्यक्ति मेरे गोपनीय स्थान तक कैसे पहुँचा, वाल्मीक रामायण में हनुमान जी ने कहा "दूतोअहमिति विग्याय राघवस्यामितौजस: श्रूयतामेव वचनं मम पथ्यमिदं प्रभो!! अर्थात मैं अमित तेजस्वी श्री राम जी का दूत हूँ ऐसा जानकर आप मेरे हितकारक वचनों को सुने, रावण को जब ग्यात हुआ कि उसका विपक्षी महान तेजस्वी है व उनके एक अनुचर ने उसकी सुरक्षित नगरी में उपद्रव मचाया है तो उसके क्रोध की सीमा ना रही, उस भयावह परिस्थिति में भी हनूमान जी अपनी श्रध्दा भक्ति के आस्पद राम के कार्य हेतु निर्भीक खड़े थे और रावण से बातें कर रहे थे, वार्तालाप के समस व पीछे दण्ड दिये जाते समय हनुमान जी के मन की स्थिति स्थिर व सक्रिय थी, इसी प्रकार हमारे युवा तथा सैनिक गंभीरता पूर्वक श्री हनुमान जी के चरित्र का अनुसरण करें।
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। पुलवामा में हुई आतंकी घटना को सुनकर आज सम्पूर्ण देश संगठित होकर घटना का विरोध कर रहा है, एकजुटता वह भी संकट की घड़ी में होना बेहद महत्वपूर्ण होती है, परन्तु यह कायराना हमला है आमने सामने के युद्ध में यदि हमारे सैनिक शहीद होते तो नजारा कुछ और होता अब सोचने की बात है 300 किलो ग्राम विस्फोट सामग्री लेकर आने वाली गाड़ी की चेकिंग हुई थी या नहीं और चेकिंग यदि हुई तो फिर तीन सौ किलो विस्फोट बचा कैसे इस बात पर एक संदेह होता है कि हमारी आन्तरिक सुरक्षा में कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है या गद्दारी इस बात की जाँच होना आवस्यक है, हमारे जवान यदि लड़ते हुये शहीद तो वे वीर अब्दुल हमीद की तरह पराक्रम दिखाते हुए शहीद होते भारतीय इतिहास में पराक्रमी वीरो की गाथा कम नहीं हैं वीर हनुमान जी की बुध्दि व पराक्रम सभी जानते हैं दूसरे देश निर्भीकता के साथ जाकर उसके गोपनीय स्थानों तक पहुंचने व नष्ट करने में पारांगत हनुमान जी की गौरव गाथा हमारे देश को गौरवान्वित करती है, वह स्थित कितनी भयावह होगी जब लंका नगरी में हनुमान जी को रावण के सम्मुख उपस्थिति किया गया और उसे पता चला कि वह राम की गुप्तचर (दूत) है व सीता का पता लगाने अशोक वाटिका जैसे अति गोपनीय स्थान में पहुँच गया है और हनुमान भी यही चाहते थे कि रावण को बता दिया जाय कि उन्हे माँ सीता का पता चल चुका है अब लंका पर आक्रमण होगा लेकिन रावण इससे भयभीत नहीं हुआ उसे क्रोध अवस्य आया था कि एक अकेला विदेशी ब्यक्ति मेरे गोपनीय स्थान तक कैसे पहुँचा, वाल्मीक रामायण में हनुमान जी ने कहा "दूतोअहमिति विग्याय राघवस्यामितौजस: श्रूयतामेव वचनं मम पथ्यमिदं प्रभो!! अर्थात मैं अमित तेजस्वी श्री राम जी का दूत हूँ ऐसा जानकर आप मेरे हितकारक वचनों को सुने, रावण को जब ग्यात हुआ कि उसका विपक्षी महान तेजस्वी है व उनके एक अनुचर ने उसकी सुरक्षित नगरी में उपद्रव मचाया है तो उसके क्रोध की सीमा ना रही, उस भयावह परिस्थिति में भी हनूमान जी अपनी श्रध्दा भक्ति के आस्पद राम के कार्य हेतु निर्भीक खड़े थे और रावण से बातें कर रहे थे, वार्तालाप के समस व पीछे दण्ड दिये जाते समय हनुमान जी के मन की स्थिति स्थिर व सक्रिय थी, इसी प्रकार हमारे युवा तथा सैनिक गंभीरता पूर्वक श्री हनुमान जी के चरित्र का अनुसरण करें।



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