हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। माया में महान शक्ति है वह बहुत बलवती होती है विद्वान महर्षियों के भी चित्त को अपने वश में करने की शक्ति होती है माया में लेकिन प्रभु की भक्ति से माया भी घबराती है भक्त का माया कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, प्रसंग आता है राम का राज्याभिषेक सुबह होना सुनिश्चित हुआ यह बात देवताओं को पता चली यहाँ अयोध्या में जगह जगह तैयारियाँ चल रही थी, देवता मॉ सरस्वती के समीप जाकर बंदना करते हैं यह सोचने की बात है बंदना देवता करें या मानव बंदना या पूजा के पीछे स्वार्थ अवस्य होगा, यहाँ क्या स्वार्थ है देवताओं का यह है कि यदि राम राज्याभिषेक होता है तो रावण की मृत्यु असंभव होगी देवताओं का जीना दूभर करदेगा रावण यही तो स्वार्थ है सुर नर मुनि की याही रीती, स्वारथ लाग करैं सब प्रीती, मतलब प्रेम के पीछे क्या है स्वार्थ की तलवार जो प्रेम के टुकड़े टुकड़े कर देती है, सरस्वती मॉ मान जांती है लोक कल्याण के कारण मंथरा की बुद्ध परिवर्तन करतीं हैं राम को वनवास हो जाता है देवता प्रसन्न हो जाते हैं प्रभु राम को चौदह वर्ष का वनवासऔर दूसरी ओर देवताओं की प्रसन्नता, महाराज दशरथ के दुख का तो कोई ठिकाना नहीं रहा वे व्याकुल व अधीर हैं लेकिन देवता प्रसन्न हैं दुख सुख का यही क्रम है, हमारे लिए जो सुख है किसी के लिए वही दुख है राम वन को चले गए, भरत सूचना पाकर घर आते हैं जब पता चला कि मेरे प्रभु राम चौदह वर्ष के लिए वन को चले गये तो कष्ट होता है व वे भी वन जाकर प्रभु को मनाने को चल देते हैं, अब यह क्या देवता पुनः मॉ सरस्वती के पास जाते हैं मॉ मेरी प्रार्थना पुनः स्वीकार करो, भरत को रोक दो वरना प्रभु राम यदि भरत के कहने से अयोध्या आ गये तो रावण का मरण असंभव होगा, यहॉ फिर स्वार्थ है देवताओं का लेकिन मॉ सरस्वती क्या कहतीं हैं सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ, निज अपराध रिसाहिं न काऊ, तब किछु कीन्ह राम रूख जानी, अब कुचालि करि होइहि हानी, फिर कहती है माँ सरस्वती जो अपराध भगत कर करई, राम रोष पावक सो जरई हे देवताओ राज्याभिषेक को रोकना प्रभु राम की इच्छा थी वह वहाँ अहित राम का था राम अपना अहित होते देख शांत रह सकते लेकिन भक्त का अहित करने वाला उनकी क्रोध रूपी ज्वाला में जलकर विनाश को प्राप्त होता है, क्या तुम जानते हो "भरत सरिस को राम सनेही, जगु जप राम रामु जप जेही, भरत जैसा राम का प्रिय कोई भी नहीं है सारा जगत राम को भजता है परन्तु राम के हृदय में भरत का वास है।
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। माया में महान शक्ति है वह बहुत बलवती होती है विद्वान महर्षियों के भी चित्त को अपने वश में करने की शक्ति होती है माया में लेकिन प्रभु की भक्ति से माया भी घबराती है भक्त का माया कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, प्रसंग आता है राम का राज्याभिषेक सुबह होना सुनिश्चित हुआ यह बात देवताओं को पता चली यहाँ अयोध्या में जगह जगह तैयारियाँ चल रही थी, देवता मॉ सरस्वती के समीप जाकर बंदना करते हैं यह सोचने की बात है बंदना देवता करें या मानव बंदना या पूजा के पीछे स्वार्थ अवस्य होगा, यहाँ क्या स्वार्थ है देवताओं का यह है कि यदि राम राज्याभिषेक होता है तो रावण की मृत्यु असंभव होगी देवताओं का जीना दूभर करदेगा रावण यही तो स्वार्थ है सुर नर मुनि की याही रीती, स्वारथ लाग करैं सब प्रीती, मतलब प्रेम के पीछे क्या है स्वार्थ की तलवार जो प्रेम के टुकड़े टुकड़े कर देती है, सरस्वती मॉ मान जांती है लोक कल्याण के कारण मंथरा की बुद्ध परिवर्तन करतीं हैं राम को वनवास हो जाता है देवता प्रसन्न हो जाते हैं प्रभु राम को चौदह वर्ष का वनवासऔर दूसरी ओर देवताओं की प्रसन्नता, महाराज दशरथ के दुख का तो कोई ठिकाना नहीं रहा वे व्याकुल व अधीर हैं लेकिन देवता प्रसन्न हैं दुख सुख का यही क्रम है, हमारे लिए जो सुख है किसी के लिए वही दुख है राम वन को चले गए, भरत सूचना पाकर घर आते हैं जब पता चला कि मेरे प्रभु राम चौदह वर्ष के लिए वन को चले गये तो कष्ट होता है व वे भी वन जाकर प्रभु को मनाने को चल देते हैं, अब यह क्या देवता पुनः मॉ सरस्वती के पास जाते हैं मॉ मेरी प्रार्थना पुनः स्वीकार करो, भरत को रोक दो वरना प्रभु राम यदि भरत के कहने से अयोध्या आ गये तो रावण का मरण असंभव होगा, यहॉ फिर स्वार्थ है देवताओं का लेकिन मॉ सरस्वती क्या कहतीं हैं सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ, निज अपराध रिसाहिं न काऊ, तब किछु कीन्ह राम रूख जानी, अब कुचालि करि होइहि हानी, फिर कहती है माँ सरस्वती जो अपराध भगत कर करई, राम रोष पावक सो जरई हे देवताओ राज्याभिषेक को रोकना प्रभु राम की इच्छा थी वह वहाँ अहित राम का था राम अपना अहित होते देख शांत रह सकते लेकिन भक्त का अहित करने वाला उनकी क्रोध रूपी ज्वाला में जलकर विनाश को प्राप्त होता है, क्या तुम जानते हो "भरत सरिस को राम सनेही, जगु जप राम रामु जप जेही, भरत जैसा राम का प्रिय कोई भी नहीं है सारा जगत राम को भजता है परन्तु राम के हृदय में भरत का वास है।



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