हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। बृम्हचर्य व्रत का अनुकरण करने वाले बाल योगी श्री पवन द्विवेदी जालौन उ०प्र ने एक भेंट वार्ता में बताया की भेष, भाव, भाषा इन सबसे बहुमूल्य है भक्ति जिसे पाना बेहद कठिन है, क्यो कि भक्ति से माया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, अब भक्ति है क्या यह जानना जरूरी है हम यदि मंदिर जाना व घंटा की ध्वनि तीव्र करने तथा भगवान का नाम जोर-जोर से चिल्ला कर लेने या पीले या लाल कपड़े पहनने को भक्ति मान लें तो भक्ति केस ही अर्थ से हम भटक जाते हैं, भक्ति का संबंध भाव से है एक छोटा सा बच्चा जो किसी प्रकार के लाल पीले कपड़े नही पहने है व मिट्टी से सना हुआ है गन्दा है लेकिन बोल भी नहीं पाता मतलब उसे भाषा का भी ग्यान नहीं है, मंदिर नहीं जा सकता उसका भगवान तो माँ है सिर्फ माँ वह चीखना जानता है चीख रहा है रो रहा है लेकिन माँ को अपने भगवान परमेश्वर रूपी पति की सेवा आवश्यक है वह खाना बना रही है बच्चा तेज आवाज में रोता है माँ गौर नहीं करती क्योकि पति को काम पर जाना है इसलिए खाना बनाने में व्यस्त रहती है बच्चा जमीन में लेट जाता है चेहरा लाल हो जाता है हाथ पैर पटकते हुये बेहद तेज आवाज में रोता है यह क्या बिना किसी श्लोक या दान तप के माँ रूपी ईश्वर दौड़ कर बच्चे को उठाती है सीने से लगाती है, बेहद दुलार करती हुई बच्चे को दूध पिलाते हुये चुप कराती है, भक्त और भगवान का भी यही हाल है जब तक भक्त मोह माया लालच सम्मान में लिप्त रहता है तब तक भगवान भी अपने कार्यों में व्यस्त रहता है जब भक्त के भाव में सिर्फ भगवान होता है व वह एक असहाय की तरह भगवान को आवाज लगाता है तो भगवान को दौड़ कर आना होता है ऐसे एक नहीं तमाम उदाहरण हैं हमारे शास्त्रों में, इसलिए भगवान को पाखण्ड नहीं स्वच्छंद निर्मल भक्ति चाहिऐ, राम चरित मानस में प्रमाण भी है प्रभु राम कहते हैं "निर्मल जल मन सो मोहि पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा, निर्मल जल की तरह विशुद्ध मन में ही प्रभु का वास होता है।
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। बृम्हचर्य व्रत का अनुकरण करने वाले बाल योगी श्री पवन द्विवेदी जालौन उ०प्र ने एक भेंट वार्ता में बताया की भेष, भाव, भाषा इन सबसे बहुमूल्य है भक्ति जिसे पाना बेहद कठिन है, क्यो कि भक्ति से माया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, अब भक्ति है क्या यह जानना जरूरी है हम यदि मंदिर जाना व घंटा की ध्वनि तीव्र करने तथा भगवान का नाम जोर-जोर से चिल्ला कर लेने या पीले या लाल कपड़े पहनने को भक्ति मान लें तो भक्ति केस ही अर्थ से हम भटक जाते हैं, भक्ति का संबंध भाव से है एक छोटा सा बच्चा जो किसी प्रकार के लाल पीले कपड़े नही पहने है व मिट्टी से सना हुआ है गन्दा है लेकिन बोल भी नहीं पाता मतलब उसे भाषा का भी ग्यान नहीं है, मंदिर नहीं जा सकता उसका भगवान तो माँ है सिर्फ माँ वह चीखना जानता है चीख रहा है रो रहा है लेकिन माँ को अपने भगवान परमेश्वर रूपी पति की सेवा आवश्यक है वह खाना बना रही है बच्चा तेज आवाज में रोता है माँ गौर नहीं करती क्योकि पति को काम पर जाना है इसलिए खाना बनाने में व्यस्त रहती है बच्चा जमीन में लेट जाता है चेहरा लाल हो जाता है हाथ पैर पटकते हुये बेहद तेज आवाज में रोता है यह क्या बिना किसी श्लोक या दान तप के माँ रूपी ईश्वर दौड़ कर बच्चे को उठाती है सीने से लगाती है, बेहद दुलार करती हुई बच्चे को दूध पिलाते हुये चुप कराती है, भक्त और भगवान का भी यही हाल है जब तक भक्त मोह माया लालच सम्मान में लिप्त रहता है तब तक भगवान भी अपने कार्यों में व्यस्त रहता है जब भक्त के भाव में सिर्फ भगवान होता है व वह एक असहाय की तरह भगवान को आवाज लगाता है तो भगवान को दौड़ कर आना होता है ऐसे एक नहीं तमाम उदाहरण हैं हमारे शास्त्रों में, इसलिए भगवान को पाखण्ड नहीं स्वच्छंद निर्मल भक्ति चाहिऐ, राम चरित मानस में प्रमाण भी है प्रभु राम कहते हैं "निर्मल जल मन सो मोहि पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा, निर्मल जल की तरह विशुद्ध मन में ही प्रभु का वास होता है।



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