जरूर पढ़ें: मेरी कलम से लिखा गया लेख
हरिद्वार की गूंज
(रजत चौहान प्रधान संपादक) हरिद्वार। श्रीनगर में पत्रकार शुजात बुखारी को आतंकवादियों ने उस समय गोलियों से भूना जब वे अपने कार्यालय से निकलकर इफ्तार के लिए जा रहे थे। उनके सिर से पेट तक 15 गोलियां मारी गई थी। उसी दिन फौजी औरंगजेब की भी अपहरण के बाद हत्या की गई। वह भी रोजा में थे एवं ईद मनाने घर जा रहे थे। रोजा रखे हुए इफ्तार के लिए और ईद के लिए जाते मुसलमान की बेरहमी से हत्या करने को इस्लाम में क्या कहा गया है, इसका उत्तर तो विशेषज्ञ दे सकते हैं।हमारे आपके लिए इसका निष्कर्ष यही है कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी इस्लाम का नाम लेकर अपने को मुजाहिदीन भले कहते हों, उनका एक ही मजहब है हिंसा से दहशत पैदा करना। इसका अर्थ यह भी है कि सरकार ने भले रमजान के पवित्र महीने को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से सैन्य कार्रवाई को स्थगित किया लेकिन आतंकवादियों के लिए इसके कोई मायने नहीं हैं। वे शांति, संवेदना या सौहार्द की भाषा नहीं समझते। जाहिर है, सरकार को इसका मूल्यांकन करना होगा कि उसने सैन्य कार्रवाई स्थगित कर सही किया या गलत। लेकिन यह एक बड़े पत्रकार की हत्या का मामला है। इसलिए आम प्रतिक्रिया यही है कि आतंकवादी स्वतंत्र अभिव्यक्ति की आवाज को भी बंद करना चाहते हैं। पता चला है कि मोटरसाइकिल पर सवार तीनों आतंकियों का संबंध लश्कर-ए-तैयबा से है। हालांकि लश्कर ने इस हत्या के पीछे अपना हाथ होने से इनकार किया है, लेकिन यह उसकी रणनीति के अलावा कुछ नहीं है। आतंकवादी समूह के लिए इस हत्या को भारत विरोधी अलगाववादियों एवं आतंकवाद के समर्थकों की नजर में भी जायज ठहराना कठिन हो गया है। लेकिन वीडियो फुटेज तो झूठ नहीं बोल सकता। एक पत्रकार की हत्या, जिसे वहां के सभी वगरे का समर्थन है, का जिम्मा वह लेना नहीं चाहता। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा हत्याएं धीरे-धीरे सामान्य घटना बन गई है। इसमें पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक र्चचा का विषय बनी है तो इसे भी अकारण नहीं माना जा सकता। आतंकवाद तीन दशक की उम्र तक पहुंच गया है, पर इसमें पत्रकारों को बहुत कम निशाना बनाया गया। कश्मीर घाटी की पत्रकारिता ऐसी नहीं रही है कि आतंकवादियों को उनसे खास परेशानी हो। वैसे बुखारी की निर्मम हत्या के बाद कई रिपोटरे में इस दौरान एक दर्जन के आसपास पत्रकारों के मारे जाने की बात की गई है। लेकिन रिकॉर्ड के मुताबिक अब तक केवल चार पत्रकार ही आतंकवादियों का शिकार बने हैं। 1991 में अलसफा के संपादक मोहम्मद शाबान वकील की हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने हत्या कर दी थी। बीबीसी के पूर्व पत्रकार युसूफ जमील 1995 में अपने कार्यालय में हुए बम विस्फोट में घायल हो गए थे। मगर उस घटना में एएनआई के फोटो पत्रकार मुश्ताक अली की मौत हो गई थी। इसके बाद, 31 जनवरी 2003 को नाफा के संपादक परवाज मोहम्मद सुल्तान की उनके प्रेस एनक्लेव स्थित कार्यालय में हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। चौथा नाम शुजात बुखारी का जुड़ गया है। इसलिए यह प्रश्न भी उठ रहा है कि आखिर किन कारणों से आतंकवादियों ने शुजात को निशाना बनाया होगा? शुजात अदबी मरकज के अध्यक्ष भी थे, जो घाटी में सबसे बड़ा साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। वैचारिक स्तर पर पत्रकारिता जिस तरह बंटा हुआ है, उसमें वे एक वर्ग के चहेते भी थे। हालांकि उनका व्यक्तिगत स्वभाव ऐसा था कि उनसे वैचारिक मतभेद रखने वाले कई पत्रकारों की अच्छी बनती थी। 14 जून को हत्या के दिन भी सोशल मीडिया पर कुछ लोगों से उनकी बहस चल रही थी। अपनी हत्या के दिन ही कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन पर आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का उन्होंने अपने ट्वीट में समर्थन किया था। उन्होंने लिखा कि यह रिपोर्ट सही है। एक ओर उस रिपोर्ट को भारत में जहां आम पत्रकारों ने खारिज किया वहीं बुखारी के समर्थन करने के कारण उन पर ट्विटर पर हमला भी हुआ। जवाबी ट्वीट में उन्होंने लिखा कि कश्मीर में हमने पत्रकारिता गर्व के साथ की है और जमीन पर जो कुछ होगा, हम उसे प्रमुखता से उठाते रहेंगे। इससे जम्मू-कश्मीर को लेकर उनकी सोच की कुछ झलक आपको मिल गई होगी। जनवरी 2015 में फ्रांस की ‘‘चार्ली हेब्दो’ कार्टून पत्रिका पर आतंकवादियों के हमले की जहां दुनिया भर में निंदा हुई, उनका ट्वीट था कि आस्था के मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं होनी चाहिए। यह भी उनकी सोच का एक दर्पण था। ऐसे और उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनसे साबित होगा कि कश्मीर और आतंकवाद के संदर्भ में उनकी सोच आम भारतीयों की सोच के समान नहीं थी। उनके अखबार और वे स्वयं कभी आतंकवादी शब्द प्रयोग करते ही नहीं थे। मिलिटेंट कहते थे। घाटी के अन्य अखबार जिस तरह की भाषा लिखते हैं, थोड़ा उनके अखबारों का स्वर उनसे संयमित होता था। जुलाई 2016 में आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद वहां की मीडिया की भूमिका केवल आग लगाने की थी। मजबूर होकर सरकार को कुछ अखबरों के प्रकाशन या केबल संचालन और कवरेज को कुछ दिनों के लिए प्रतिबंधित करना पड़ा। इसमें शुजात बुखारी का अखबार शामिल नहीं था। इसका कारण यह था कि उनका समूह खबरें और विचारों में शब्दों का चयन ज्यादा बुद्धिमता से कर रहा था। हां, रमजान महीने में जब सरकार ने सैन्य कार्रवाई को स्थगित किया तो उन्होंने इसका स्वागत किया। रमजान में सैन्य ऑपरेशन स्थगित करने के बावजूद आतंकवादी हिंसा को उन्होंने जायज नहीं ठहराया और बार-बार शांति की बात की। केंद्र ने जब दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार बनाया तो उन्होंने इसे अच्छा कदम बताया। वार्ता में उनकी भूमिका भी बताई जाती थी। कई अवसरों पर उनकी एवं उनके अखबार की भाषा कश्मीर के मामले में सरकार में पीडीपी या मुख्यमंत्री की भाषा के समान होती थी। यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि केंद्र सरकार ने उनकी हैसियत देखते हुए उन्हें ट्रैक 2 कूटनीति में शामिल किया था। तो क्या यह माना जाए कि आतंकवादी अपने से थोड़ा भी परे भाषा को सहन करने को तैयार नहीं हैं? पूरी बात तो हत्यारों की गिरफ्तारी के बाद ही पता चलेगी। कुल मिलाकर घटना दुखद है। आतंकवादियों ने अन्य पत्रकारों में यह भय पैदा कर दिया है कि अगर बुखारी को रास्ते से हटाया जा सकता है तो किसी को भी हटाया जा सकता है। जबकि शुजात की हत्या शुद्ध आतंकवादी घटना है।
Share To:

Post A Comment:

0 comments so far,add yours