हरिद्वार की गूंज
(गगन शर्मा) हरिद्वार। आखिर कब तक सरकारी अस्पताल के सी एम ओ अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहेंगे? इनके लिये सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था सामान्य बात हो गई है। इनमे से एक महिला अधिकारी का कहना था कि मीडिया को खबर चलाने के लिये सरकारी अस्पताल ही मिलते है। यह हाल उस समय का है जब जिले के कर्मठ जिलाधिकारी दीपक रावत ने कामचोर, सुस्त ओर लापरवाह अधिकारियों की नाक में दम कर रखा है। मगर कुछ डीठ टाइप के अधिकारी टूटने को तैयार रहते हैं मगर न तो खुद की कार्यशैली बदलेंगे न ही बीमार अस्पताल को स्वस्थ करने की कोई सकारात्मक पहल करना चाहेंगे। इतनी महंगी सैलरी लेकर भी यदि अस्पताल की व्यवस्था सुधारने में नाकाम है तो इनको सस्पेंड करके घर बैठाना बहुत जरूरी है। वो भी उस समय जब प्राइवेट डॉक्टर व्यापारी बनकर मरीज को ग्राहक से ज्यादा कुछ नही समझते और अपने व्यवहार के चलते अपना आम इंसानों से विश्वास खो चुके है तो ऐसे में एक गरीब व्यक्ति सरकारी अस्पताल की ओर ही रुख करेगा। मगर वहां पहुँच कर उसे कभी डॉक्टर छुटटी पर मिलते है तो कभी वहाँ की मशीनें खराब मिलती है। ऊपर से वहाँ के सफाई कर्मचारियों से लेकर बड़े डॉक्टर तक सभी का रोगियो के प्रति व्यवहार सहनुभूति वाला न होकर अभद्र होता है। तो फिर आम आदमी खुद की किस्मत को कोसता है। जगजीतपुर निवासी आर्यन उपाध्याय अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर जब सरकारी अस्पताल पहुँचे तो वहाँ उनको बोला कि यहाँ कि अल्ट्रासाउंड मशीन तो खराब है आप रानीपुर मोड़ पर प्राइवेट में अल्ट्रासाउंड करा कर लाओ। जबकि उस समय किसी भी समय उनकी पत्नी की डिलीवरी हो सकती थी। इस तरह की अव्यवस्था सरकारी अस्पताल में तब तक चलेगी जब तक कि दोषी अधिकारियों पर कोई सस्पेंड होने का डर न हो। इन्ही लापरवाह अधिकारियों के कारण ही काफी लोगो को राज्य सरकार और केंद्र सरकार को कोसने का मौका मिल जाता है। स्वास्थ्य मंत्री को इस विषय मे गम्भीरता पुर्वक विचार करने की सख्त जरूरत है।
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