हरिद्वार की गूंज (24*7)
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(गगन शर्मा) हरिद्वार। जिन अधिकारियों को हरिद्वार की जनता की सेवा करने के लिये हरिद्वार में भेजा जाता है वही अधिकारी जनता और मीडिया के फोन उठाने या बाद में उन्हें अपनी प्रतिक्रिया देने से अक्सर बचते देखे जाते हैं। यही कारण है कि विकास के नाम पर हरिद्वार की जनता खुद को ठगी महसूस करती हैं। महिलाओ के सम्मान में बड़ी बड़ी बाते करने वाले नेता औऱ अधिकारी शहर के बाजारों में उन्हें शुलभ शौचालय देने में पिछले कई वर्षों से स्वयं को असहाय महसूस देखे जा रहे हैं। जब अतिक्रमण हटाने की बात हो तो हरिद्वार को तौड़ फोड़ कर सीरिया, इराक बनाने में देर नही लगती। मगर जब महिलाओं और आम जनता को शुलभ शौचालय की बात हो तो उनके पास जगह मिलना असम्भव हो जाता हैं। इसे आवश्यकता और मानसिकता की कमी ही कहेगे कि जिम्मेदार अधिकारी जनता को इसकी वैकल्पिक व्यवस्था देने में भी असहाय सिद्ध हो जाते हैं। क्या इसी मानसिकता से हरिद्वार को स्वच्छ और साफ रखने की गलतफहमी दिमाक में पाले हुवे है। लक्सर रोड से जितनी महिलाएं और पुरूष सवारियां ऑटो, मेटाडोर आदि से आते हैं, उन्हें यदि लघुशंका जाना हो तो उनके पास अवधुत मण्डल उर्फ शंकर आश्रम के पास खुले में शौच के अलावा कोई विकल्प नही मिलता है। यही हाल रानीपुर मोड़ (चन्द्राचार्य चौक) का है। जहां दिनभर आम जनता खुले में शौच करने को विवश हैं। हरिद्वार की कोई भी समस्या ऐसी नही जिसका जनसहभागिता से हल संभव न हो। मगर ऐसा लगता है कि अधिकारियों का अहंकार बीच मे रुकावट बन रहा है। जिसके कारण वो जनता या मीडिया के फोन उठाना जरूरी नही समझते।जिससे हरिद्वार की जनता काफी पीड़ित हैं। कनखल कृष्णा नगर बाजार में भी व्यापारियों और जिला प्रशासन के सूझबूझ से एक शुलभ शौचालय बनाना सुंदर कनखल स्वच्छ कनखल के लिये जरूरी है।
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