हरिद्वार की गूंज (24*7)

(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। मनुष्य अपने फायदे के लिए तालाबोंको खत्म करते जा रहे हैं, लिहाजा आज देश में पीने के लिए पानी को लोग तरस रहे है। मिटते सिमटते तालाब मौजूदा जल संकट की बड़ी वजह है। एक समय था जब शहर हो या गांव हर जगह तालाब आसानी से नजर आ जाते थे। और हमारे पूर्वजों ने भी तालाबों के महत्व को समझा था। लेकिन मौजूदा समय में तालाब का संरक्षण और विकास एक बड़ा सवाल बन गया है। और तालाब का मानव से जीवंत रिश्ता रहा है। यह एक सामूहिक और साझा संस्कृति का एक स्थल भी रहा है। आज तालाब सिकुड़ते जा रहे हैं। इसकी संख्या निरंतर घटती जा रही है। तालाबों पर अतिक्रमण और भरे जाने की प्रक्रिया के कारण आज भूजल का संकट ज्यादा गहरा गया है। जिसका जिम्मेदार कहीं ना कहीं पूर्ण रूप से प्रशासन रहा है। क्योंकि तालाबों पर अतिक्रमण प्रशासन से छुपा नहीं है। उनका भराव कर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गई। और यह कार्य प्रशासन की भूमिका के बिना संभव नहीं है। क्योंकि प्रशासन के कर्मचारियों की पूर्व से ही गांव में आए दिन आवाजाही रही है। गांव के विकास और गांव की समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी देखते आए हैं। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है की तालाबों पर अतिक्रमण प्रशासनिक, अधिकारी कर्मचारियों की ही देन है। जो आगे चलकर पेयजल समस्या का बड़ा कारण बनेगा। वही हरिद्वार जिला भी इससे बचा नहीं है। लगातार हरिद्वार जिले में घटता भूजल इसका गवाह है। कारण जिले में अधिकतर तालाबों पर अतिक्रमण कर बिल्डिंगे खड़ी है। या अधिकतर सरकारी फाइलों में तालाब तो दर्शाए गए हैं लेकिन मौके पर तालाबों का नाम निशान नहीं है। जिससे भविष्य में आने वाली नस्लों के सामने पीने के पानी का बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है। और यह भी कड़वी सच्चाई है कि तालाबों के वजूद पर संकट और इनकी घटती संख्या के पीछे चकबंदी विभाग व तहसील प्रशासन की लापरवाही का अहम कारण है। यह भी कहा जा सकता है दोनों विभागों के अधिकारियों की भ्रष्टाचारी के कारण तालाबों पर संकट गहराया है। जिससे अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हुए हैं। जिसका मौजूदा गवाह बहादराबाद ब्लॉक के ग्राम पुरणपूर साल्हापुर में स्थित राम जोड़ा है। उक्त भूमि पर पूर्व में सालों पहले गुरु रविदास ने गुरु नानक के साथ कथा की थी। जिस कारण उक्त भूमि को 12 बीघे छोड़ा गया था लेकिन वह चकबंदी पटवारी के कारण भ्रष्टाचारी की भेंट चढ़कर लगभग 4 बीघे रह गई है। और इस पर भी अतिक्रमण करने के लिए षड्यंत्र रचा जा रहा है। उक्त 12 बीघा जमीन में पूर्व के कागजों में तालाब दर्शा हुआ है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण मौके पर तालाब की जगह अतिक्रमण ही अतिक्रमण है। जिससे तालाब की भूमि सुकड कर रह गई है। जिसको पूरा कराने के लिए समाजसेवी प्रदीप चौधरी ने अपने स्तर से आवाज बुलंद भी की है और उच्चधिकारियों से लेकर शासन प्रशासन, मुख्यमंत्री आदि को लिखित पत्र देकर अवगत भी कराया है लेकिन अफसोस कार्रवाई जीरो है। यही कारण है जिससे जिले में अधिकतर तालाबों का अस्तित्व खत्म हो चुका है और भविष्य में पेयजल व भूजल संरक्षण पर खतरा उत्पन्न भी हो सकता है। प्रशासन को इस ओर गंभीरता से विचार कर कदम उठाना होगा। और जिले में अतिक्रमण किए हुए तालाबों को मुक्त कराकर उनके सुंदरीकरण कराने होंगे। और लगातार पैनी नजरे रखनी होगी। जिससे कोई भी व्यक्ति तालाबों पर अतिक्रमण न कर सके। जिससे भविष्य में पेयजल की समस्या से हमारी नस्लों के सामने संकट उत्पन्न ना हो सके।

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