हरिद्वार की गूंज (24*7)

(यतेंद्र कुमार) हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के वनस्पति एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग में आज 28 सितम्बर 2020 को विश्व रेबीज दिवस मनाया गया। यह एक अन्तराष्ट्रीय अभियान है, जो ग्लोबल एलायंस फार रेबिस कन्ट्रोल नामक गैर सरकारी संगठन के द्वारा समन्वित किया जाता है। इस दिवस को रेबीस विषाणु के बारे में जागरूकता एवं बचाव अभियान के रूप में मनाया जाता है। रेबीस से प्रतिवर्ष हजारों लोगों की मौत हो जाती है। यह विषाणु पालतू जानवरों जैसे- कुत्ता, बन्दर, बिल्ली, खरगोस, एवं चूहे इत्यादि में पाया जाता है। विश्व रेबीस दिवस पर वनस्पति एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि प्रो० रूप किशोर शास्त्री, कुलपति गु०का०वि हरिद्वार ने प्रतिभागीयों को वेद एवं शास्त्रों में वर्णित सूक्ष्मजीव एवं विषाणुओं से होने वाली बिमारियों के विभिन्न आयामों से अवगत कराया। उन्होने कहा कि इस विषय पर गम्भीर शोध की आवश्यकता है, यह विषाणु पालतू जानवरों के काटने या चाटने या खून का जानवरों के लार से सीधे सम्पर्क में आने से फैल सकता है। रेबीज एक जानलेवा रोग है जिसके लक्षण बहुत देर में नजर आते है ओर समय रहते इसका इलाज न किया जाये तो यह जानलेवा साबित हो सकता है। साथ ही उन्होने प्रतिभागियों से साफ-सफाई एवं स्वच्छता के साथ रहने का आह्वान किया। प्रो० डी०के माहेश्वरी ने भी छात्र-छात्राओं को रेबीज के विषय में वैज्ञानिक जानकारी देते हुए इसके बचाव एवं रोकथाम के तरीकों पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता प्रो० निशांत राय, ग्राफिक ईरा विश्वविद्यालय, देहरादून ने प्रतिभागियों को रेबीज के विषाणु के आनुवंशिक प्रकृति, संरचना एवं संक्रमण के प्रकार तथा इस बिमारी से होने वाले लक्षण एवं प्रभावों से अवगत करायां। जीव विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो० नवनीत, ने बताया कि पूरे विश्व में हर दो सेकण्ड में रेबीज के विषाणु के संक्रमण के कारण एक मौत हो जाती है, जोकि अपने आप में चैकाने वाला तथ्य है। प्रो० आर०सी दूबे विभागाध्यक्ष, वनस्पति एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग ने प्रतिभागियों को रेबीज दिवस क्यों मनाया जाता है के बारे विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि इस बिमारी के विषय में 40 हजार साल पहले से शास्त्रों में वर्णित है। उन्होने इस बिमारी के संक्रमण एवं विस्तृत विकास एवं अन्तिम प्रभाव के विषय में क्र्रमानुसार जानकारी से अवगत कराया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, एशिया और अफ्रीका में होने वाली लगभग 95 प्रतिशत से अधिक लोगों की मृत्यू के कारणें में से रेबीज को पाया गया है। उन्होने बताया कि संक्रमण के बाद रेबीज का विषाणु लगभग 15.20 वर्ष तक सुसुप्त अवस्था में किसी भी मनुष्य के शरीर में पडा रहता है, और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर सक्रिय अवस्था में आकर रेबीज की बिमारी कर सकता है। जिसके होने पर मौत का होना निश्चित होता है। बच्चे कुत्ते के काटने के प्रति अतिसंवेदनशील होते है, इसलिए उन्हे रेबीज से संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है। यह अनुमान लगाया गया है कि पन्द्रह वर्ष की आयु से कम उम्र के बच्चों की मृत्यू में से दस में चार की मृत्यू रेबीज के कारण होती है। यह विषाणु संक्रमण होने के बाद रीढ की हड्डी ओर मस्तिष्क में पहुच जाता है जिसके बाद इसके लक्षण और संकेत संक्रमित व्यक्ति में दिखायी देने लगते है। सबसे पहले इस रोग की रोकथाम के लिए लुई पाश्चर ने पहली प्रभावी रैबीज वैक्सीन विकसित की थी। साथ ही प्रो० दूबे ने बताया कि हवन की राख का सूक्ष्मजीवों पर प्रभाव एवं जल शुद्धिकरण में उपयोग के बारे में प्रतिभागियों को अवगत कराया। इस अवसर पर प्रतिभागियों को डेंगू, टाईफाइड एवं शुगर आदि की जांच का प्रयोगात्मक अध्ययन एवं परीक्षण करना सिखया गया। इस अवसर पर डा० हरिश चन्द्र डा० संदीप कुमार डा० कार्तिक कुमार गुप्ता, डा० विनीत विश्नोई, चन्द्र प्रकाश, शिव कुमार, अमरीश कुमार, मनमोहन सिंह, अभिमन्यु राणा सहित 100 से अधिक छात्र एवं सभी शोध छात्र-छात्रायें उपस्थित थे।

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