हरिद्वार की गूंज (24*7)

(गगन शर्मा) हरिद्वार। गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ० शिवकुमार चौहान का कहना है कि देश की आजादी से जुडें आंदंोलन तथा वैदिक पुनरूत्थान मे आर्य समाज का योदान सदैव प्रंशनीय एवं सरानीय रहेगा। आर्य समाज के नायकों ने देशप्रेम को अपना सर्वोच्च अधिकार मानते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए अपनेे प्राणों की आहुतियाॅ दी वही देश, काल एवं परिस्थितिवश निर्णय लिया। आर्य समाज के नायक आजादी के ऐसे मतवाले एवं दीवाने थे कि उन्होने अपनी विचारधारा तथा कार्यशैली को क्रियान्वित करते हुए विराट संकट की घडी में देशहित मे फैसले लिये तथा आजादी की सफलता प्राप्त की। ऐसी ही वैदिक विचारधारा के मतवाले गुरू विरजानंद का जीवन प्रसंग हम सब के लिए प्रेरणाप्रद है। स्वामी विरजानन्द (1778-1868) एक संस्कृत विद्वान, वैदिक गुरु और आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु थे। इनको मथुरा के अंधे गुरु के नाम से भी जाना जाता था। इनका जन्म मोह्याल दत्त परिवार में पंजाब के करतारपुर में 1778 इस्वी में हुआ। इनका बचपन का नाम - वृज लाल था। पाँच साल की उम्र में चेचक के कारण ये पूर्ण अंधे हो गए। 12वें साल में माँ-बाप चल बसे और भाई-भाभी के संरक्षण में कुछ दिन गुजारने के बाद ये घर से विद्याध्ययन के लिए निकल पड़े। कुछ काल तक इधर भटकने के उपरांत ये आध्यात्मिक नगरी के रूप में विख्यात ऋषिकेश आए और कुछ काल ऋषिकेश में एक आश्रम में रहने लगे। यहां इनका सम्बंध स्वामी पूर्णानन्द से हुआ जिनके सानिध्य में वैदिक व्याकरण और आर्ष शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। बाद में संस्कृत विद्वानों की प्रसिद्ध नगरी काशी (बनारस) जाकर 10 साल तक 6 दर्शनों (वेदान्त, मीमांसा, न्यायादि) तथा आयुर्वेदादि ग्रंथों का अध्ययन किया। फिर बोध गया (बिहार) जाकर  उपनिषदों के तुलनात्मक अध्ययन का काम किया। इन्हे कलकत्ता में संस्कृत ज्ञान के लिए प्रशंसा मिली। इसके बाद एक निमंत्रण पर अलवर आए और यहाँ उन्होंने शब्द-बोध ग्रंथ की रचना की। इसकी मूल प्रति अब भी अलवर के संग्रहालय में रखी है। इन्होने मथुरा में पाठशाला स्थापित की। जिसमें देश भर से संस्कृत जिज्ञासु आए। इसके काम के लिए गुरू विरजानंद को राजपूतों ने खूब दान दिया। लगभग इसी समय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्य को जानने की अभिलाषा से घर परिवार त्यागकर सच्चे गुरू की खोज में निकले। भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए वे सन् १८६० में गुरूवर स्वामी विरजानन्द के आश्रम में पहुंचे। जहां उन्हें नई दृष्टि, सद्प्रेरणा और आत्मबल मिला। वर्षों तक भ्रमण करने के बाद जब वे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में गुरू विरजानन्द जी की कुटिया पर पहुंचे तो गुरू विरजानन्द ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं। तब स्वामी दयानन्द ने कहा, गुरूवर यही तो जानना चाहता हूं कि वास्तव में, मैं कौन हूं? प्रश्न के उत्तर से संतुष्ट होकर गुरूवर ने दयानन्द को अपना शिष्य बनाया। गुरूवर स्वामी विरजानन्द उच्च कोटि के विद्वान थे, उन्होंने वेद मंत्रों को नई दृष्टि से देखा और वेदों की एक नवीन व्यवस्था प्रदान की। उन्होंने दयानन्द जी को वेद शास्त्रों का अभ्यास कराया। अध्ययन कार्य पूरा होने के बाद जब दयानन्द जी गुरू विरजानन्द जी को गुरू दक्षिणा के रूप में थोडी से लौंग, जो गुरू जी को बहुत पसन्द थी लेकर गये तो गुरू जी ने ऐसी दक्षिणा लेने से मना कर दिया। उन्होंने दयानन्द से कहा कि गुरू दक्षिणा के रूप में, मैं यह चाहता हूं कि समाज में फैले अन्ध विश्वास और कुरीतियों को समाप्त करो। गुरू जी के इस आदेश को शिरोधार्य करके स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक उत्थान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनकी पावन स्मृति में पंजाब के करतारपुर के ग्रैंड ट्रंक रोड पर एक स्मारक बनाया गया जिसकी आधारशिला बद्रीनाथ आर्य ने रखी जिन्होंने बाद में आर्य समाज नैरोबी की स्थापना की। 14 सितम्बर 1971 को गुरू विरजानंद की स्मृति में भारत सरकार के डाक विभाग ने एक डाक टिकट जारी किया। आजादी के आन्दोलन और वैदिक पुनरुत्थान में आर्य समाज का योगदान अतिप्रशंसित रहा। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद को गुरूवर स्वामी विरजानन्द से प्राप्त ज्ञान एवं मार्गदर्शन के बल पर देश मे फैले अंधविश्वास एवं कुरीतियों को दूर करते हुए पाखड खंडनी पताका के माध्यम से नवजागृति लाने का काम किया। आधुनिक भारत के निर्माण में आर्य समाज की विचारधारा, महर्षि दयानंद जैसे शिष्य तथा गुरूवर विरजांनद जैसा गुरू मिलने के कारण ही गुरू-शिष्य परम्परा का सूत्रपात हुआ। जिसका महत्व देश की संस्कृति एवं प्राचीन परम्परा के संरक्षण मे स्वतः ही अनुभव हो रहा है।

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