हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। व्यक्ति के जीवन मे शिक्षा तथा विद्या दोनो का विशेष महत्व है। शिक्षा जीवन मे आचरण में सुधार करती है जबकि विद्या बुद्वि की कुशाग्रता का विकास करती है। बाद मे यही आचरण तथा बुद्वि की कुशाग्रता व्यक्ति मे संस्कारो की संवाहक बनती है। एक सद्पुरूष बनने के लिए दोनो का होना अनिवार्य है। बुद्वि की कुशाग्रता के लिए पुस्तकों का अध्ययन.अध्यापन किया जाना जरूरी है। जिसका उचित एवं प्रमाणिक केन्द्र पुस्तकालय है। पुस्तकालय सभी अवस्था के व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है। विविध विषयों से जुडी पुस्तकों को पढने से रूचि बढती है जो बाद मे व्यवहार एवं स्वभाव मे परिवर्तन लाती है। एक विद्यार्थी तथा रिसर्च करने वाले शोधार्थी के जीवन मे पुस्तकालय का विशेष महत्व है। इसी महत्व को सर्वप्रथम अनुभव करके सी०आर रंगनाथन पुस्तकालय जगत के जनक बने। जिन्होने सर्वप्रथम पुस्तकालय जगत की स्थापना करते हुए पुस्तकों के वर्गीकरण तथा क्लासिफाइड केटलाॅग के कोड बनाने का कार्य किया। उन्होने पुस्तकालय विज्ञान को महत्व प्रदान करके भारत मे इसका प्रचार.प्रसार किया। सी०आर रंगनाथन ने मद्रास क्रिश्चयन काॅलेज से अपनी शिक्षा पूरी करके सर्वप्रथम सन् 1921/23 तक प्रेजिडेंसी काॅलेजए मद्रास विश्वविद्यालय मे अध्यापन कार्य किया। सन् 1924 मे उन्हे मद्रास विश्वविद्यलय का पहला पुस्तकालयाध्यक्ष बनाया गया। इस पद की योग्यता हासिल करने के लिए यूनिवर्सिटी काॅलेजए लंदन गए तथा वहां से लौटने के बाद सन् 1947/54 तक बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय का पुस्तकालयाध्यक्ष एवं पुस्तकालय विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। सन् 1962 मे सी०आर रंगनाथन ने बंगलोर में प्रलेखन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया और उसके प्रमुख बनें। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धि पर उन्हे सन् 1965 में पुस्तकालय विज्ञान मे राष्ट्रीय शोध प्राध्यापक की उपाधि से सम्मामनित किया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ० राजेन्द्र प्रसाद ने सी०आर रंगनाथन के 71 वी जन्मवर्षगांठ पर बधाई देते हुए लिखा.
डॉ० रंगनाथन ने न केवल मद्रास विश्वण्विद्यालय ग्रन्थालय को संगठित और अपने को एक मौलिक विचारक की तरह प्रसिद्ध किया अपितु सम्पूर्ण रूप से देश में ग्रन्थालय चेतना उत्पन्न करने में साधक रहे। विगत 40 वर्षों के दौरान उसके कार्य और शिक्षा का ही परिणाम है कि भारत में ग्रन्थालय विज्ञान तथा ग्रन्थालय व्यवसाय उचित प्रतिष्ठा प्राप्त कर सका। डॉ० रंगनाथन केवल वर्गीकरणाचार्य के रूप में ही नहींए अपितु एक वर्गकार के रूप में भी जाने जाते हैं। सन् 1946/47 के दौरान जब वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ग्रन्थालय विज्ञान के प्रोफेसर तथा पुस्तकालयाध्यक्ष थेए उन्होंने अपनी वर्गीकरण योजना के अनुसार विश्वविद्यालय ग्रन्थालय के लगभग एक लाख ग्रन्थों का फिर से वर्गीकरण लगभग 18 महिनों के अल्प समय में किया। इस कार्य के लिये उन्होंने अपने ही दिये गये नियम उपसूत्रद्ध परासरण का नियम की सहायता ली। महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि यह सब कुछ उन्होंने अपने उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों जैसेण्पाठन कार्यए प्रशासनिक कार्यों आदि का पालन करते हुये अपनी 56 वर्ष की अवस्था में किया। डॉ० रंगनाथन ने सर्वण्प्रथम वर्गीकरण सिद्धान्तश् का सूत्रपात किया। यह सिद्धान्त वर्गीकरण तन्त्रों का ढाँचा तैयार करने तथा अन्य शब्द भंडार नियन्त्रक उपायों के लिए तारतम्यताए एकरूपता और ठोसपन प्रदान करते है।
पुस्तकालय जगतए वर्गीकरण तथा क्लासीफाइड केटलाग के जनक सी०आर रंगनाथन को शिक्षा मे पुस्तकालय जैसी अमूल्य निधि प्रदान करने के लिए सदैव स्मरण करता रहेगा। ऐसे विद्वान का 27 सितम्बर 1972 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी 48 वी पुण्यतिथि पर शिक्षा की विभिन्न विद्याओं से जुडे विद्वान अपनी श्रद्वांजलि अर्पित करते है।



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