हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। भारत दुनिया का शायद इकलौता ऐसा देश होगा जिसने अनेक बार अपने स्वाभिमान के लिए शक्ति सम्पन्न देशों से लोहा लिया और अपने व्यवहार से विषम स्थितियों मे भी धैर्य एवं सहनशीलता का परिचय देते हुए सभी के कल्याण हेतु सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया के सिद्वान्त का पालन करते हुए एक ऐसी मिसाल पेश की है कि जिससे प्रभावित होकर शक्तिशाली देश भी भारत की महानता एवं सामथ्र्य के कायल हो गये है। भारत के इसी भाव का असर देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी देखने को मिलता है। गुलामी के काल खण्ड में ब्रिटिश वायसराय एवं गवर्नर जनरल जो अपने व्यवहार की क्रूरता के कारण जाने जाते थे, परन्तु भारत आकर जब उन्होने यहां के वाशिन्दों के व्यवहार मे मानवता से सम्पन्न गुणों एवं उनके पालन हेतु अपने जीवन की भी परवाह न करने वाले लोगों को देखा तो उनका हदय परिवर्तित हुआ। और वे सभी भारत की महानता के कायल हुए। भारत की आजादी से जुडे अनेकों दस्तावेजों मे इसकी छाप दिखाई देती है।
भारत ने एक लम्बें समय तक गुलामी का अभिशाप झेला है। जिसका कारण भी हमारी मानवता एवं सभी के कल्याण की कामना परिलक्षित होती है। भारत की गुलामी की कहानी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ प्रारम्भ होती है जिसका उददेश्य केवल भारत मे व्यापार करना था। परन्तु ब्रिटिश जैसे चालाक लोग जिनके जीवन मे क्रुरर्ता एवं धोखा ही धोखा था। मानवीय गुणों का उनके जीवन मे कोई महत्व नही था। भारत की इसी कमजोरी का लाभ लेकर बरतानिया हुकुमत ने सैकडों साल हमे गुलाम बनाये रखा। जिससे मुक्ति की संघर्ष भरी यात्रा का नाम है अगस्त क्रान्ति।
भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए तमाम छोटे-बड़े आंदोलन किए गए। अंग्रेजी सत्ता को भारत की जमीन से उखाड़ फेंकने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई उसे अगस्त क्रांति के नाम से जाना गया है। इस लड़ाई में गांधी जी ने करो या मरो का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। यही वजह है कि इसे भारत छोड़ो आंदोलन या क्विट इंडिया मूवमेंट भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को हुई थी, इसलिए इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई जिसे अगस्त क्रांति मैदान नाम दिया गया। आजादी के इस आखिरी आंदोलन को छेड़ने की भी खास वजह थी। दरअसल जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत से उसका समर्थन मांगा था, जिसके बदले में भारत की आजादी का वादा भी किया था।
भारत से समर्थन लेने के बाद भी जब अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने का अपना वादा नहीं निभाया तब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम युद्ध का एलान कर दिया। इस एलान से ब्रिटिश सरकार में दहशत का माहौल बन गया। आज से 78 साल पहले आज ही के दिन 9 अगस्त 1942 को इस क्रांति का एलान किया गया जिसके कारण 9 अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे का इतिहास है कि 4 जुलाई 1942 के दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर भी पार्टी दो धड़ों में बंट गई। कांग्रेस के कुछ लोग इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे। इसी की वजह से कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती गोपालाचारी ने पार्टी छोड़ दी। यही नहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद भी इस प्रस्ताव को लेकर पशोपेश में थे लेकिन उन्होंने गांधीजी के आह्वान पर इसका समर्थन करने का निर्णय लिया। वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं तक ने इस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। लेकिन कांग्रेस पार्टी अन्य दलों जिसमें मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा को अपने साथ ला पाने में कामयाब न हो सकी। इन्होंने इस आंदोलन का विरोध किया। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन यानी अगस्त क्रांति का प्रस्ताव पारित किया गया।
आज भारत एवं इसके एक सौ तीस करोड नागरिक गुलामी से मुक्ति पाने के इस पवित्र दिन को कैसे भूल सकते है।
आओं हम सब इस पवित्र दिन के अवसर पर प्रण ले कि हम सब देश की एकता एवं अखण्डता के लिए व्यक्तिगत एवं सामाजिक द्वेष एवं भेदभाव के कारणों को भुलाकर देश की प्रगति को अपना लक्ष्य मानकर इसके विकास को गति प्रदान करते हुए एवं स्वावलम्बी एवं आत्म निर्भर बनने की दिशा मे आगें बढने का प्रयास करते रहेगे।



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