हरिद्वार की गूंज (24*7)
(ज्योति शर्मा) लेखिका
कुछ गाँव वालो ने अनानास में पटाखे भरकर इस गर्भवती भूखी हथिनी को दिया, उसके बाद हथिनी के मूँह में पटाखे फूटने लगे, उसका मूँह फटचूका था। असहनीय दर्द से तड़प कर उसने जलते हुए मूँह को राहत देने के लिए पास ही नदी में चली गयी और पानी में खड़ी हो गई, वहां व्यक्तियों के डर से बाहर नहीं निकली और पानी में तीन दिनो तक रही उसी समय उसका गर्भ पात हो गया, और उसने तीसरे दिन अपनी हिम्मत छोड़ दी उसने दम तोड़ दिया।
केरल के गाँव में गर्भवती हथिनी की हत्या
जब ईश्वर ने इस संसार को रचा संसार में सभी को अपने कर्म बाटें, पशुओं के लिए रचे जंगल उनके लिए बनाई नदियां झीले, पक्षियों को दिया खुला आकाश, वृक्षों और बनस्पतियों से कहा तुम मनुष्यों और पशु-पक्षियों का भरणपोषण करो, धरा का सीना चीर कर उगाया धान। जब उसने मनुष्य को रचा उसे दिया एक मस्तिष्क जिसमें भरा ज्ञान चातुर्य बल, ताकी मेरी रची प्रकृति का रक्षक बने उस मूढमति मनुष्य ने कुछ ऐसा अन्याय किया पशुओं के बनस्पतियों को काट डाला बनाए बड़े भवन, फिर पशुओं को बनाया अपना भोजन, भूख शांत करने को आज सबसे बड़ा राक्षस भक्षक मनुष्य ही तो है ये समय ईश्वरीय प्रकोप है ये हमरा कर्म है जो लोटकर आ रहा है, हर उस आह के साथ जब पशुओं और पक्षियों को कष्ट हुआ होगा।
।।वह देखती रही नदी के मुहाने पर खड़ी होकर, मनुष्य की क्रूरता को, इस मनुष्य को चुना ईश्वर ने हमारा रखवाला।।




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