हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। प्रकृति का अनुपम सौंदर्य जल, जंगल और जमीन से है। इनमे से किसी एक के पतन होने से जहां यह संतुलन बिगडता है वही प्रकृति का सौंदर्य भी क्षीण होता है। संतुलन एवं सौदर्य से जुडी ये दोनो घटनाएं ही मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरा है। प्रकृति की अनुपम सौगात जल, जंगल और जमीन तीनों ही रूप मे मानव मात्र का सर्वाधिक कल्याण करती है। जल जहां जीवन को आधार प्रदान करता है। वही जंगल इस आधार को सौदर्य एवं अलंकरण से विभूषित करता है और जमीन इन दोनों को अपना आंगन एवं संरक्षण प्रदान करती है जिसकी सन्निध में प्रकृति का यह स्वरूप मानव मन को स्पंदित एवं आहलादित करता है। इसलिए मनुष्य को इस संतुलन को बनाने के लिए संवेदनशील रहते हुए प्रयत्न करते रहना चाहिए। 27 मई की एक ऐसी घटना मनुष्य की संवेदनशीलता तथा उसके दोहरे चरित्र को तार-तार करती है। जंहा व्यक्ति अपने क्षणिक सुख अथवा स्वार्थ के लिए जंगली जानवर की जान के महत्व को कम आंकता है। ऐसा ही एक वाक्या केरल मे मादा हाथिन के जीवन से जुडी घटना से उदघाटित हुआ है। जिसने पूरी मानवता को शर्मसार किया है। इस घटना मे एक गर्भस्थ मादा हाथिन द्वारा पटाखें से भरा अनानास खा लेने के कारण अपनी जिंदगी के साथ अपने गर्भस्थ शिशु की जान से भी हाथ धोना पडा। साईलेंट वैली के वाॅर्डन सैमुअल मचाऊ के अनुसार वह हाथिन 3 दिनों तक दर्द से तडपती रही है, परन्तु इस हाल मे भी उसने किसी व्यक्ति को कोई नुकसान नही पहुॅचाया। हाथिन पास के जलाशय में शायद इसलिए चली गई कि अपनी पीडा को कम कर सके। परन्तु ऐसा नही हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कारण कुछ भी हो आखिर हाथिन ने अपनी तथा अपने गर्भस्थ शिशु की जान गंवा दी। अर्थात प्रकृति के संतुलन से जुडी एक कडी कमजोर हुई है। जंगली जानवर की जिंदगी के लिए मनुष्य जैसे एक अभिशाप बनता जा रहा है। अपने व्यक्तिगत हितार्थ आज के मनुष्य ने सदा ही अपनी सीमाओं का सर्वाधिक अतिक्रमण किया है। जंगली जानवरों के लिए न जंगल छोडे है और न ही पानी के प्राकृतिक स्रोत। जंगल के समीप अपने रिहायश या विश्राम घर बनाकर मनुष्य ने जंगली जानवरों के जीवन को अपनी विलासिता का साधन मान लिया है। ऐसी स्थिति के कारण जानवर जंगल से बाहर आ रहे है। जब जंगली जानवर जंगल से बाहर आते है और किसी मनुष्य को हानि पहुंचाते है। तब वे आदमखोर घोषित कर दिए जाते है। सरकारी व्यवस्था के भी मनुष्य जीवन का महत्व जंगली जानवर से अधिक आंका जाने के कारण ऐसे जानवर को शूटर के माध्यम से मौंत के घाट उतार दिया जाता है। ऐसी घटनाएं अवश्य ही पूरी मानवता के लिए एक चुनौती है। आओं पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर हम ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो ऐसा संदेश देने का प्रयास करे। जिससे जल, जंगल, जानवर और जमीन का यह संबंध बना रहे।



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