हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। दुनियाभर मे विनाशकारी महामारी का प्रयाय बन चुकें कोरोना के संक्रमण से जहां मानसिक व शारीरिक परेशानियाॅ बढ रही है। वही सुरक्षित व्यक्ति भी कोरोना संक्रमण के बिना ही इतना भयभीत है कि उसे मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। दैनिक जीवन की जिन समस्याओं को वह सहज ढंग से हैडल कर लेता था आज वही रोजमर्रा की चुनौतियाॅ उसे भीमकाय शरीर जैसी सुदृढ एवं विशाल स्वरूप मे दिखाई पड रही है। इन समस्याओं के कारण आम आदमी की भावनाएं एवं सामाजिक सामंजस्य के बीच दूरी पैदा हो गई है। भय से व्याप्त माहौल दिन प्रतिदिन हमारे चारो ओर एक अनचाहे खतरे के रूप में बढता ही जा रहा है। कब-कौन-कहां संक्रमित मिल जाए इसका पता नही है। मनोदशा ऐसी हो गई है कि एक परिचित व्यक्ति सामने दिखाई पड जाने पर दूसरा जानकार व्यक्ति उससे बचने का प्रयास कर रहा है। आलम यह है कि सामान्य औपचारिता पूर्ण करने से भी व्यक्ति घबरा रहा है। ऐसी स्थिति मे एकाकी जीवन जीना कब तक सम्भव है इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है। ये सभी स्थितियाॅ व्यक्ति के सामने एक नई तरह की चुनौतियाॅ पैदा कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भावानात्मक दबाव तथा अनचाहे तनाव के कारण आम आदमी भी मनोरोगी होता जा रहा है। उसके इन अनसुलझे प्रश्नों का जवाब न तो खुद के पास है और न ही इनके जवाब लेने के लिए वह कही जा सकता है। मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाये तो बच्चों के मन और दिमाग पर भी इस महामारी के भय का असर दिखाई पड रहा है। यानी परिवार में बडे सदस्यों की मनोदशा का प्रभाव बच्चों मे भी घबराहट पैदा कर रहा है। वैश्विक स्तर पर आंकडों को देखने से लगता है कि इस महामारी से अभी बहुत जल्दी मुक्ति मिलना संभव नही है। स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार के अनुसार देश में संक्रमण से पिछले 10 दिन में सबसे ज्यादा मौतें हुई है यानि संक्रमण की दर तथा संक्रमित व्यक्तियों की मौत अभी देश के कोरोना वारियर्स के लिए चुनौती बनी हुई है, कोरोना महामारी के दृष्टिकोण से आम आदमी को मनोवैज्ञानिक स्तर पर तैयार किये जाने की आवश्यकता है। क्योकि इस महामारी ने पूरे सामाजिक ढांचे को बदलने की जरूरत पैदा कर दी है, आने वाले चुनौतियाॅ हो सकती है इससे भी जटिल हो इसके लिए साधारण से साधारण व्यक्ति को भी आत्म संयम रखते हुए अपनी जरूरतों को सीमित करना पडेगा और अपने ग्रामीण परिवेश की छोटी छोटी बातों को फिर से अपने व्यवहार मे लाने का प्रयास अभी आरम्भ कर देना पडेगा, तभी कोरोना जैसी चुनौतियो का मुकाबला करने के लिए हम स्वयं को मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार कर सकेगे।



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