हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। शहर से गांव में बढता पलायन एवं संक्रमण लाॅकडाउन में बैठे-बैठे एक सवाल अनायास ही मन मे उठ चला कि यदि कोरोना जीवन से दूर हो जाए और व्यक्ति इस लाॅकडाउन के समय की विषमताओं से भरी जिंदगी के कारण उत्पन्न भय और तनाव की स्थिति से बाहर निकलने का प्रयास करें, तो उसे पहले क्या करना है। 17 मई को लाॅकडाउन के तीन चरण पूरे हो जाने तथा 18 मई से चौथा चरण आरम्भ होने से रूकी हुई अर्थव्यवस्था को भले ही कुछ गति मिलने की संभावना हो। परन्तु चुनौतियां भी कम नही है। ऐसे मे यह प्रश्न एक सकारात्मक सोच को जन्म देने वाला लगता है कि हम चुनौतियों से मुकाबला करते हुए जीतने का साहस रखते है। यदि परिस्थितियों की गम्भीरता को समझे तो अभी यह सवाल भले ही अर्थहीन तथा औचित्य से परे लगता हो। परन्तु यह हम सब भली भाॅति समझ चुकेे है कि कोरोना संक्रमण से पहले जिस जीवन शैली के हम आदि थे उसके साथ अब जीवन संभव नही है। जिंदगी के उन सभी तौर-तरीकों से हमे बाहर निकलना पडेगा, जो हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग थे। भारत की 65 फीसदी से ज्यादा आबादी गांव में बसती है। 21 वी सदी के भारत के रूप में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास गांव को साधन सम्पन्न बनाने की दिशा मे प्रधानमंत्री जनधन, ग्रामीण किसान योजना, किसान सम्मान योजना, शौचालय के माध्यम से स्वच्छता अभियान, मातृ कल्याण योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से उपलब्धियाॅ प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ रहे हो, वही तकनीकी संसाधनों के बढते उपयोग से भले ही गांव आज सम्पन्नता के आयाम प्राप्त करते जा रहे हो, परन्तु गांव में शहर के मुकाबले संसाधन एवं सुविधाओं में बडा अन्तर आज भी है। कोरोना महामारी के कारण शहरों मे उत्पन्न हालात से शहर छोड कर गांव वापस लौटे प्रवासी लोगो से यह आंकडा बढना स्वभाविक है। सुविधाओं तथा रोजगार के जिस अन्तर के कारण लोग गांव से शहर पलायन कर चुके थे। ऐसे मे पुनः शहर से गांव में वापस पलायन करने पर उन सुविधाओं पर बोझ बढेगा। जिनके बारे में अभी समय रहते विचार किया जाना आवश्यक है। इसलिए सामाजिक विश्लेषणकत्र्ता, रणनीतिकार, अर्थ-जगत के विशेषज्ञों को इस ओर मंथन करने की आवश्यकता है कि इस कोरोना पेन्डामिक से उपजे संकट तथा गांव की वर्तमान स्थिति इन चुनौतियों का सामना कर पाने में कितना सामर्थवान है।



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