हरिद्वार की गूंज (24*7)
रक्षित चौहान, आयु 19 वर्ष, बी०पी०ई०एस० प्रथम वर्ष, गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
लेख। माँ मेरे लिए एक शब्द नही बल्कि यह पूरी सृष्टि का आधार है। परमात्मा ने इस पृथ्वी से पहले जब आकाश और प्रकृति की रचना की तो विधाता को उसमे अहसास की कमी महसूस हुई। फिर उसने मां की उत्पत्ति कर इस आकाश और प्रकृति को अहसास की किरणों से मनोहर एवं रमणीक बनाया। जिससे जीवन मे आनन्द एवं सुख की अनुभूति हुई। मां इस भूमि पर स्नेह और ममता की प्रतिमूर्ति है, उसके अहसास के बिना बच्चे का जीवन निरलक्ष्य एवं वीरान लगता है, उसे पल-पल अपने असहाय तथा अनाथ होने का गम परेशान करता है, महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन को देखकर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है, जो दोे माताओं का पुत्र होने पर भी स्वयं को हीन एवं असहाय महसूस करता रहा। मै स्वयं अपने जीवन मे मां के मातृत्व का मीठा अहसास अनुभव करता हूं। जब मै काॅलेज से घर पहुॅचता हूं तो मां को देखकर अनायास ही एक सुरक्षा का बोध होता है। मेरे चेहरे को देखकर उसकी आंखो की खुशी मानो चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाती है। वो मेरी परेशानी से असहाय हो पीडा का अनुभव करती है। लेकिन उसे देखकर मेरे मन को जैसे एक सुकुन जरूर मिलता है कि अब चिंता की कोई बात नही अर्थात सारी परेशानियों का हल मां है। मां भी अपने बच्चे के छोट-बडे सभी कष्टों को दूर करने के लिए तैयार रहती है और इसकी एवज मे वह बस मेरी एक मुस्कराहट चाहती है। मेरी एक मुस्कुराहट मानो उसकी मेहनत का परिणाम है, मां का होना इस जीवन में सुख दुख का अहसास है, मेरे लिए मेरी मां ही भगवान का अवतार है। तुम कुछ भी कहो दुनिया वालो बच्चो के लिए मां ही तारणार है।



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