हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। जो दुर्गम दैत्य को मारती है वह दुर्गा कहलाती है। दुर्ग मतलब कठिन कार्य। कठिनता से जूझने वाली  है देवी दुर्गा। दुर्गा जो हमारी नवरात्रि की देवी हैं। यह कथन है देव संस्कृति विश्व विद्यालय के कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्या का। वे मृत्युंजय सभागार में आयोजित नवरात्र कक्षा में युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे थे। सत्संग के ४था दिन गीता के ४ अध्याय के २५ श्लोक की व्याख्या करते हुए युवा प्रेरक डॉ. पण्ड्या ने यज्ञ दो तरह के होते हैं- देवयज्ञ और योगयज्ञ। देवयज्ञ कहते हैं देवताओं का पूजन, देवों का यजन, देवों के लिए आहुति अर्पण और योगयज्ञ कहते हैं आत्मा का परमात्मा में मिलन। उन्होंने कहा कि हमारी साधना इतनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएं की आत्मा परमात्मा से मिल जाए। इससे पूर्व संगीतज्ञों ने वायलिन, बांसुरी आदि वाद्ययंत्रों साथ ‘होता हे सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से गीत से उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव बलदाऊ देवांगन, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, स्वयंसेवी कार्यकर्त्ता, छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। उधर शांतिकुंज के मुख्यसभागार में उपस्थित नवरात्र साधकों को संबोधित करते हुए देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने की साधना का नाम नवरात्र साधना है। इन दिनों की जाने वाली साधना आंतरिक ऊर्जा का जागरण कराने वाली है। उन्होंने कहा कि यह असाधारण समय है और ऐसे समय में असाधारण शक्ति के स्रोत सर्वशक्तिमान माता गायत्री की साधना से अनेकानेक लाभ मिलता है, जो लौकिक व पारलौकिक स्तर पर हमें सुख, समृद्धि प्रदान करती है। भारतीय आर्षग्रंथों में गायत्री महामंत्र का उल्लेख करते हुए प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय ने कहा कि भगवान् विष्णु ने विश्व की संरचना तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी रावण के वध से पूर्व गायत्री महामंत्र का जप किया था। वर्तमान समय में भी नियमानुसार गायत्री अनुष्ठान करने से ईश्वर की अनुकंपा सुनिश्चित रूप से मिलती है। इस अवसर पर देश-विदेश से आये गायत्री साधकों के अलावा बड़ी संख्या में अंतेवासी कार्यकर्त्ता भाई-बहिन भी उपस्थित रहे। 
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