(गगन शर्मा) हरिद्वार। भारत मे बेरोजगारी की समस्या कोई नई बात नही है। मौसमी बेरोजगारी के अलावा अपने देश मे विभिन्न प्रकार की बेरोजगारी देखी जाती है।
पिछले कई सदियों से भारत में विभिन्न सरकार बेरोजगारी को दूर करने के वादे तो बहुत करती है मगर उसमे पर्याप्त सफलता नही मिलती है।
जिसके कारण देश का युवा वर्ग ही नही अपितु बुजुर्ग भी कम परेशान नही है। युवा का तो कम से कम शरीर तो साथ दे देता है, मगर बुजुर्गों की हालत ज्यादा दयनीय होती है। एक ओर बढ़ती महंगाई तो दूसरी ओर कमाई का कोई निश्चित साधन न होना जीवन मुश्किल में डाल देता है। व्रद्धावस्था में रोजमर्रा के खर्चो के अलावा दवाइयों का खर्च भी कम परेशान नही करता। ऐसे में बहुत से बुजुर्ग जिनके पास आय का कोई निश्चित साधन न होने के कारण जब वो कोई छोटा मोटा काम करना चाहते हैं तो उनके पास दुकान या ठिकाना न होने के कारण उन्हें सड़क किनारे या फुटपाथ पर सामान बेचने को विवश होना पड़ता है। जब वो कोई खीरे, पापड़, कच्चा गोला, या अन्य सामान बेचकर गुजारा करना चाहते हैं तो इससे पहले की उनका सामान बिके उससे पहले पुलिस, नगर निगम, या और कोई आकर उनका सामान जब्त कर लेते हैं। या उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर कर देते हैं। जिला प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार को चाहिए कि वो अपना विवेक का इस्तेमाल करते हुवे इन निर्धन, कमजोर और छोटे व्यापारियों के हित मे कुछ निर्णय ले ताकि ये लोग भी चैन के साथ दो जून की रोटी खा सके। क्योकि ये वो लोग है जो भीख नही मांग सकते, ये मेहनत करके खाना पशनद करते हैं। आम लोगो को भी चाहिए कि वो ऐसे छोटे निर्धन व्यापारियों से समान खरीदने में प्राथमिकता दे। प्रशसन चाहे तो अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुवे इनके बैठने का उपयुक्त स्थान दे सकती है।
पिछले कई सदियों से भारत में विभिन्न सरकार बेरोजगारी को दूर करने के वादे तो बहुत करती है मगर उसमे पर्याप्त सफलता नही मिलती है।
जिसके कारण देश का युवा वर्ग ही नही अपितु बुजुर्ग भी कम परेशान नही है। युवा का तो कम से कम शरीर तो साथ दे देता है, मगर बुजुर्गों की हालत ज्यादा दयनीय होती है। एक ओर बढ़ती महंगाई तो दूसरी ओर कमाई का कोई निश्चित साधन न होना जीवन मुश्किल में डाल देता है। व्रद्धावस्था में रोजमर्रा के खर्चो के अलावा दवाइयों का खर्च भी कम परेशान नही करता। ऐसे में बहुत से बुजुर्ग जिनके पास आय का कोई निश्चित साधन न होने के कारण जब वो कोई छोटा मोटा काम करना चाहते हैं तो उनके पास दुकान या ठिकाना न होने के कारण उन्हें सड़क किनारे या फुटपाथ पर सामान बेचने को विवश होना पड़ता है। जब वो कोई खीरे, पापड़, कच्चा गोला, या अन्य सामान बेचकर गुजारा करना चाहते हैं तो इससे पहले की उनका सामान बिके उससे पहले पुलिस, नगर निगम, या और कोई आकर उनका सामान जब्त कर लेते हैं। या उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर कर देते हैं। जिला प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार को चाहिए कि वो अपना विवेक का इस्तेमाल करते हुवे इन निर्धन, कमजोर और छोटे व्यापारियों के हित मे कुछ निर्णय ले ताकि ये लोग भी चैन के साथ दो जून की रोटी खा सके। क्योकि ये वो लोग है जो भीख नही मांग सकते, ये मेहनत करके खाना पशनद करते हैं। आम लोगो को भी चाहिए कि वो ऐसे छोटे निर्धन व्यापारियों से समान खरीदने में प्राथमिकता दे। प्रशसन चाहे तो अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुवे इनके बैठने का उपयुक्त स्थान दे सकती है।





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