हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। कागज से बने पोस्टर को लगाने वालों का इतना आंतक छाया हुवा है कि पोस्टर लगाने वाले पोस्टर लगाने से पहले ये देखना भी आवश्यक नही समझते कि जिस बोर्ड पर वो पोस्टर चिपका रहे हैं
वो सरकारी है या प्राइवेट। उन्हें तो बस अपनी संख्या पूरी करने से मतलब होता है। एक चित्र में बीएचईएल का बोर्ड है तो दूसरा उत्तराखंड टूरिज़्म का बोर्ड है। इन दोनों बोर्ड पर लगे पोस्टर बता रहे हैं कि पोस्टर लगाने वालों का दुस्साहस कितना बढ़ा हुवा है। इस बार लोकसभा चुनाव की हरिद्वार में अच्छी बात ये रही कि वो मकान स्वामी जो महंगी महंगी पुताई कराकर अपना घर, दुकान, इमारत सजाते है चुनाव के दौरान पोस्टर लगाने वाले पूरे मकान की पुताई खराब कर देते थे जो कि इस बार किन्ही कारणों से पोस्टर से लोगो के मकान बच गए। लेकिन व्यवसाय के प्रचार करने के चक्कर मे सरकारी बोर्ड और लोगो के मकान पर पोस्टर लगाकर उन्हें बर्बाद करने वालो पर अंकुश कैसे लगे ये गम्भीर प्रश्न है। काफी कॉलेज या अन्य लोग अपनी इमारत पर लिखवा देते हैं कि पोस्टर लगाने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जायेगी। उसके बावजूद कनखल जगजीतपुर के महिला विद्यालय डिग्री कॉलेज की दीवार पर हर बार पोस्टर लगाने वाले रात को उनकी दीवार खराब करके निकल जाते हैं। जब उन पोस्टर पर लिखे नम्बर पर सम्पर्क किया जाता है तो वो ये कहकर अपना पीछा छुड़ाते है कि हमने तो पोस्टर लगाने का ठेका दिया था। इसमे हमारा क्या दोष हमने तो उन्हें नही कहा था कि पोस्टर आपके यहाँ लगाये। बीएचईएल के सुरक्षा अधिकारी कमल कुलश्रेष्ठ का कहना है, इसका समाधान यही है कि जिस फर्म का भी पोस्टर हो कार्यवाही उसी पर होनी चाहिए। प्रशासन इस विषय मे कुछ करने से हमेशा से बचता आया है। जो कि निराशाजनक है।
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