हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। आयुर्वेद का भारत देश से बहुत ही प्राचीन सम्बन्ध रहा है। रामायण काल में युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए तो सुषेन वैध द्वारा बताई गई संजीवनी बूटी से ही लक्ष्मन जीवित हुवे थे। जड़ी बूटियों द्वारा छोटे बड़े रोगों का निदान आर्युवेद द्वारा संम्भव होता था। आज भी नीम, एलोविरा, तुलसी, करेला, लोंग, आदि मसाले, सब्जी, फल से मानव जीवन का बड़ा ही गहरा नाता है। उसके बाद समय बीतता गया विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धति जैसे होम्योपैथी, एलोपैथी द्वारा मानव शरीर की चिकित्सा होने लगी। आर्युवेद का महत्त्व जो कम हुवा उसके पीछे नई नई चिकित्सा प्रणालियों की वजह से नही, बल्कि वो व्यापारी रूपी चिकित्सक रहे जो अधिक मुनाफा कमाने के लिये आर्युवेदिक घटकों की गुणवत्ता और मानकों से समझौता कर बैठे।
इस सब के बीच उत्तराखंड के हरिद्वार में वर्षो से संचालित ऋषिकुल आर्युवेदिक फार्मेसी और चिकित्सालय में आज भी डॉ देवेंद्र कुमार सेमवाल के प्रयासों के कारण आर्युवेदिक दवाई अपने गुणवत्ता के लिये पूरे देश मे प्रशिद्ध है। परिस्तिथि कैसी भी रही हो भले ही बजट का अभाव रहा हो मगर आर्युवेदिक दवाइयों में गुणवत्ता देने में कभी समझौता नही किया। डॉ सेमवाल ने बताया कि कोई भी औषधि के निर्माण में गुणवत्ता बनाये रखने के लिये जो जो आवश्यक पदार्थों की जरूरत होती है उसे सीधा किसी डीलर अथवा मार्केट से न लेकर उसे अनेक जगहो से मंगवाकर उनके नाम कॉड के आधार पर रखकर ही उच्च अनुभवी चिकित्सक ही उन पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करते हैं। जो सेंपल जांच में सर्वोत्तम पाया जाता हैं उसी डीलर से उस पदार्थ जैसे इलायची, लोंग, शिलाजीत आदि मंगवा कर दवाइयों में डाला जाता है। इस प्रक्रिया के कारण ही ऋषिकुल आर्युवेदिक की दवाइयों की डिमांड उत्पादन से कही ज्यादा है। भारतीय सेना, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में ऋषिकुल फार्मेसी की दवाइयों की बहुत मांग है। डॉक्टर सेमवाल ने हरिद्वार की गूंज को बताया कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में गरीबी का वो स्तर देखा है जहां के निवासियों के पास खाने के लिये सब्जी, फल की सुविधाएं बहुत ही कम होती है। वहां के निवासियों के पास खाने के लिये पर्याप्त साधन नही तो उपचार के लिये पैसे कैसे जुटायेंगे। ऐसे लोगो को देखकर उन्होंने र्दडनिश्चय किया कि वो अपने कार्यकाल में सरकार द्वारा आम जनता दी जाने वाली आर्युवेदिक औषधियों की गुणवत्ता में कभी समझौता नही होने देंगे।
उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार को चाहिए कि आम जनता को समर्पित ऐसी संस्थाओं की हर सम्भव मदद करनी चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार आज एलोपैथी दवाइयों का इस्तेमाल करने वालो की संख्या में तेजी से व्रद्धि हुई है। मगर उसके कारण रोग घटने की अपेक्षा बढ़े भी है। लेकिन आर्युवेदिक पद्धति में रोग जाने में भले ही थोड़ा समय ले मगर उस रोग का निदान स्थाई रूप से होता है। जनता को भी चाहिए कि वो अधिक से अधिक ऋषिकुल फार्मेसी की दवाइयों का जगजीतपुर, कलियर, बहादराबाद, सुल्तानपुर आदि जगहों से आर्युवेदिक दवाई लेकर स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। आयुर्वेद का भारत देश से बहुत ही प्राचीन सम्बन्ध रहा है। रामायण काल में युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए तो सुषेन वैध द्वारा बताई गई संजीवनी बूटी से ही लक्ष्मन जीवित हुवे थे। जड़ी बूटियों द्वारा छोटे बड़े रोगों का निदान आर्युवेद द्वारा संम्भव होता था। आज भी नीम, एलोविरा, तुलसी, करेला, लोंग, आदि मसाले, सब्जी, फल से मानव जीवन का बड़ा ही गहरा नाता है। उसके बाद समय बीतता गया विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धति जैसे होम्योपैथी, एलोपैथी द्वारा मानव शरीर की चिकित्सा होने लगी। आर्युवेद का महत्त्व जो कम हुवा उसके पीछे नई नई चिकित्सा प्रणालियों की वजह से नही, बल्कि वो व्यापारी रूपी चिकित्सक रहे जो अधिक मुनाफा कमाने के लिये आर्युवेदिक घटकों की गुणवत्ता और मानकों से समझौता कर बैठे।
इस सब के बीच उत्तराखंड के हरिद्वार में वर्षो से संचालित ऋषिकुल आर्युवेदिक फार्मेसी और चिकित्सालय में आज भी डॉ देवेंद्र कुमार सेमवाल के प्रयासों के कारण आर्युवेदिक दवाई अपने गुणवत्ता के लिये पूरे देश मे प्रशिद्ध है। परिस्तिथि कैसी भी रही हो भले ही बजट का अभाव रहा हो मगर आर्युवेदिक दवाइयों में गुणवत्ता देने में कभी समझौता नही किया। डॉ सेमवाल ने बताया कि कोई भी औषधि के निर्माण में गुणवत्ता बनाये रखने के लिये जो जो आवश्यक पदार्थों की जरूरत होती है उसे सीधा किसी डीलर अथवा मार्केट से न लेकर उसे अनेक जगहो से मंगवाकर उनके नाम कॉड के आधार पर रखकर ही उच्च अनुभवी चिकित्सक ही उन पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करते हैं। जो सेंपल जांच में सर्वोत्तम पाया जाता हैं उसी डीलर से उस पदार्थ जैसे इलायची, लोंग, शिलाजीत आदि मंगवा कर दवाइयों में डाला जाता है। इस प्रक्रिया के कारण ही ऋषिकुल आर्युवेदिक की दवाइयों की डिमांड उत्पादन से कही ज्यादा है। भारतीय सेना, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में ऋषिकुल फार्मेसी की दवाइयों की बहुत मांग है। डॉक्टर सेमवाल ने हरिद्वार की गूंज को बताया कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में गरीबी का वो स्तर देखा है जहां के निवासियों के पास खाने के लिये सब्जी, फल की सुविधाएं बहुत ही कम होती है। वहां के निवासियों के पास खाने के लिये पर्याप्त साधन नही तो उपचार के लिये पैसे कैसे जुटायेंगे। ऐसे लोगो को देखकर उन्होंने र्दडनिश्चय किया कि वो अपने कार्यकाल में सरकार द्वारा आम जनता दी जाने वाली आर्युवेदिक औषधियों की गुणवत्ता में कभी समझौता नही होने देंगे।
उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार को चाहिए कि आम जनता को समर्पित ऐसी संस्थाओं की हर सम्भव मदद करनी चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार आज एलोपैथी दवाइयों का इस्तेमाल करने वालो की संख्या में तेजी से व्रद्धि हुई है। मगर उसके कारण रोग घटने की अपेक्षा बढ़े भी है। लेकिन आर्युवेदिक पद्धति में रोग जाने में भले ही थोड़ा समय ले मगर उस रोग का निदान स्थाई रूप से होता है। जनता को भी चाहिए कि वो अधिक से अधिक ऋषिकुल फार्मेसी की दवाइयों का जगजीतपुर, कलियर, बहादराबाद, सुल्तानपुर आदि जगहों से आर्युवेदिक दवाई लेकर स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं।



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