हरिद्वार की गूंज (24*7)

(शिवाकान्त पाठक) कविता। ओढ़ तिरंगा जब सीमा पर भारत का बेटा सोया है!!

 इंसानो की बात छोड़ दो, स्वयं तिरंगा भी रोया!!

 कहे तिरंगा मुझे ओढ़कर सुनता तो जा जाने वाले!!

भरे पड़े हैं वीर देश में उनको धूल चटाने वाले!!

 सिंह गर्जना कर दे मैने सब पाकर तुझको  खोया है!!

 इंसानो की बात छोड़ दो स्वयं तिरंगा भी रोया है!!

 लेकर हाथों में हरदम ही तुमने मुझको लहराया है!!

 मेरी आन बान की खातिर दर्द सदा तूने पाया है!!

 देख आज अपनी आखों को अश्रु कणों से फिर धोया है!!

इंसानो की बात छोड़ दो स्वयं तिरंगा भी रोया है!!

शहीदों को श्रध्दाँजली स्वरूप भेंट।।
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