हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) कविता। माता मुझे अभी मत मारो! दुनियाँ को कुछ पल तो देखूँ अन्धकार से मुझे उबारो!!

माता मुझे अभी मत मारो! वादा करती हूँ दिल तेरा कभी ना दुखने दूँगी!

रिस्ते नाते सभी तोड़ कर तेरे साथ रहूंगी!! बेबस और लाचार दुखी मन की पीड़ा स्वीकारो!

माता मुझे अभी मत मारो! तेरे मूक समर्थन से माँ मेरी मृत्यु निकट है!

अभी ब्यथा सुनाऊँ किसको ये भारी संकट है!! अंतिम चीख सुनो माँ मेरी तुम हिम्मत ना हारो!!

 माता मुझे अभी मत मारो!जीवन जीने से पहले ही मृत्यु मुझे दिखलाई! गलती क्या थी माँ वह तुमने नहीं बताई!!

श्राप तुम्हे दूंगी सुनलो मानवता के हत्यारो! माता मुझे अभी मत मारो! माता मुझे अभी मत मारो!!

कन्या भ्रूण हत्या पर राष्ट्रहित में स्वरचित।
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