हरिद्वार की गूंज (24*7)

(बृजेश पांडेय) कविता हरिद्वार।

इधर नये साल का नवयौवन,

अंगड़ाई ले रहा आज द्धार,

आ मेरी जिंदगी..

एक और मना ले नया साल !

उधर एक लाल सियाचिन में खड़ा,

बन्दूक ताने निहार रहा दुश्मन को आर-पार,

जाने कब, कौन से गोली आकर

ले जाये उसे मौत की दीदार,

और यहाँ एक और लाल..

कल भी भूखा सोया था फुटपाथ पर

नूतन वर्ष के स्वागत में,

अचानक खूब पटाखे चले रात में

झूमते चिल्लाते नाचते लोग..

कभी उन्हें सूनी आँखों से देखता ..

खुश होता ..फिर डर जाता ..

पास बैठी ठिठुरती मां के स्तन से दूध चूसता

एक प्रश्न जेहन में लिए ..

बता न माँ..  क्या आज क्या नयी बात है ?

आज कौन से अनोखी सौगात है ..?

मां बोली बेटा आज साल की आखरी रात है

...अरे सो जा मेरे लाल..

मैं भीख मांगती हूँ तू हर रोज़ रोता है..

सायद कल नया सबेरा आएगा..

इधर ख़ुद को भूलने की हद तक.

नशे में डूबे हमारा नवयुग-लोग

स्वागत कर रहे नए साल का !

बेईमान-बेलगाम ज़िन्दगी को,

भूलते का आखिरी आखिरी प्रयास..

वह आख़िरी पल, जिसके बाद

सिर्फ ‘कलेण्डर’ नया होता है,

इधर नये साल का नवयौवन,

अंगड़ाई ले रहा आज द्धार !

इधर नये साल का नवयौवन,

अंगड़ाई ले रहा आज द्धार,

आ मेरी जिंदगी..

एक और मना ले नया साल !


बृजेश पांडेय
उप-महाप्रबंधक - दीपगंगा, हरिद्धार
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