हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। स्त्री जो मॉ, बहिन, बेटी व पत्नी के रूप पुरूष के साथ अपने फर्ज निभाना ही अपना कर्तव्य समझती है आज का पुरूष उसे बड़ी अमानवीयता के साथ तरह तरह की यातनायें देने व बलात्कार तथा हत्या जैसे दर्दनाक उदाहरण पेश करने में अपने आप को बेहतर साबित करना चाहता है, शर्म व मर्यादा की सारी सीमीयें तोड़ कर बड़ी निर्लज्जतापूर्वक आगरा में एक बेटी को जलाना सारे पुरूष वर्ग के लिए बेहद शर्मसार करने वाली घटना है, अमानवीयता का अनुसरण करने वाला पुरूष बेटे को जन्म देते समय नारी की असहाय पीड़ा को भूल कर कामुकता भरी नजरों से स्त्री में बहिन या मॉ को नहीं देखता वल्कि उसे खिलौने का रूप देता है बड़े बेशर्मी से नारी की मर्यादा का चीरहरण करने को पुरुषत्व समझने की भूल करने वाले कायर व्यक्ति याद करें कि जब नाही अपनी मर्यादा की रक्षा स्वयं करती है तो वह कभी फूलन देवी तो कभी रानी लक्छमी बाई बनती है, वैसे पुरूष वर्ग ने सदैव नारी का उपहास उड़ाया है कभी नीलामी का रूप देकर स्वयम्बंर प्रथा के जरिये नारी जाति का मदाक बनाया गया तो कभी युद्ध में जीत कर लाई स्त्रियों को पाण्डवो में बाँटा गया कितनी बेहयायी से हम अपनी जननी माँ बहिनों का उपहास करते रहे आपने अम्बा अंबालिका के बिषय में सोचा है कभी उसकी पीड़ा समझने की कोशिश भी कोई नहीं करता, स्वयम्बंर प्रथा में नारी की अपनी कोईमर्जी नहीं थी कोई भी बीरता दिखा कर उसे वरण कर सकता था आज भी बूढ़े मॉ बाप को अनाथ आश्रम में छोड़ कर हम अपनी असभ्यता व अनैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, हमें व आपको नारी सम्मान की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, कानून व न्याय व्यवस्था के सहारे नारी के साथ होने वाले अन्याय अत्याचार की रोकथाम सम्भव नहीं है।
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। स्त्री जो मॉ, बहिन, बेटी व पत्नी के रूप पुरूष के साथ अपने फर्ज निभाना ही अपना कर्तव्य समझती है आज का पुरूष उसे बड़ी अमानवीयता के साथ तरह तरह की यातनायें देने व बलात्कार तथा हत्या जैसे दर्दनाक उदाहरण पेश करने में अपने आप को बेहतर साबित करना चाहता है, शर्म व मर्यादा की सारी सीमीयें तोड़ कर बड़ी निर्लज्जतापूर्वक आगरा में एक बेटी को जलाना सारे पुरूष वर्ग के लिए बेहद शर्मसार करने वाली घटना है, अमानवीयता का अनुसरण करने वाला पुरूष बेटे को जन्म देते समय नारी की असहाय पीड़ा को भूल कर कामुकता भरी नजरों से स्त्री में बहिन या मॉ को नहीं देखता वल्कि उसे खिलौने का रूप देता है बड़े बेशर्मी से नारी की मर्यादा का चीरहरण करने को पुरुषत्व समझने की भूल करने वाले कायर व्यक्ति याद करें कि जब नाही अपनी मर्यादा की रक्षा स्वयं करती है तो वह कभी फूलन देवी तो कभी रानी लक्छमी बाई बनती है, वैसे पुरूष वर्ग ने सदैव नारी का उपहास उड़ाया है कभी नीलामी का रूप देकर स्वयम्बंर प्रथा के जरिये नारी जाति का मदाक बनाया गया तो कभी युद्ध में जीत कर लाई स्त्रियों को पाण्डवो में बाँटा गया कितनी बेहयायी से हम अपनी जननी माँ बहिनों का उपहास करते रहे आपने अम्बा अंबालिका के बिषय में सोचा है कभी उसकी पीड़ा समझने की कोशिश भी कोई नहीं करता, स्वयम्बंर प्रथा में नारी की अपनी कोईमर्जी नहीं थी कोई भी बीरता दिखा कर उसे वरण कर सकता था आज भी बूढ़े मॉ बाप को अनाथ आश्रम में छोड़ कर हम अपनी असभ्यता व अनैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, हमें व आपको नारी सम्मान की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, कानून व न्याय व्यवस्था के सहारे नारी के साथ होने वाले अन्याय अत्याचार की रोकथाम सम्भव नहीं है।



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