हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। एक अध्यात्म प्रंसग में बृजेश पाण्डेय सहायक महाप्रबंधक दीपगंगा अपार्टमेंट हरिद्वार ने कहा कि हमारे अन्तर्मन में व्याप्त अन्धकार ही तो अग्यानता का प्रतीक है हमारा अतीत अन्धकार होता है अन्धकार का अर्थ है शून्य अन्धकार हमारा मूल है यदि हम जीवन के अतीत में जायें तो देखने को मिलता है कि हम गर्भ में अन्धकार में थे घोर अन्धकार शून्य से हमारे जीवन का सफर शुरू होता व हमारी दौड़ हमारा प्रयास प्रकाश होता है सर्व प्रथम मॉ हमें गुरू की तरह प्रकाश पथ पर ले जाने का काम करती है इसलिए हमारे शास्त्रों में मॉ का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ बताया है माँ की ममता, त्याग, व बलिदान वास्तव में सराहनीय व अविस्मरणीय होता है तभी तो देवता भी कहते हैं कि "अपराध सहस्राणि कृियन्ते अर्हनिशम् मया, दासोअयमिति माम मत्वामि छमस्व परमेश्वरी, अर्थात माँ मुझसे जाने अन्जानें में हजारों अपराध होते रहते परन्तु मुझे अपना सेवक जानकर मेरे अपराधों को मॉफ करें।
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