हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। सतसंग प्रसंग के दौरान विशाल वालिया ने कहा कि प्रेम मनुष्य के लिए नहीं अपितु ईश्वर को प्राप्त करने हेतु उपयोगी सिद्ध होता मनुष्य के लिए मनुष्यता से बड़ा कोई भी धर्म नहीं है ईश्वर बिना प्रेम के वशीभूत हो ही नहीं सकता क्योंकि रामचरित मानस में उल्लेख मिलता है हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना, यह कौन कहता है भगवान शंकर कहते हैं सभी देवताओं से जब रावण के अत्याचार से पृथ्वी दुखी होकर पितामह बृम्हा जी के पास गयी तब परमतत्व भगवान नारायण के पास जाने की सलाह सभी देवताओ को दी गई परन्तु परमपिता नारायण कहॉ मिलेगें कैसे मिलेगें यह सोच देवताओं को हुआ तब शंकर भगवान कहते हैं वह सभी जगह समान रूप में है देवताओ ने कहा कि दिखेगा कैसे तो भोले नाथ बोले प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना मतलब मैं जानता हूँ भोले नाथ ने कहा उनका अपना अनुभव था इसीलिए विस्वास के साथ कह रहे हैं कि प्रेम ऐक ऐसा तत्व है जिससे भगवान प्रकट हो जाते हैं लेकिन प्रेम नाशवान वस्तु से करने की चीज नहीं है मनुष्य तो नाशवान है तो फिर प्रेम ते केवल भगवान से करना चाहिए।
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