हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। भगवान शिव अपने आराध्य प्रभु राम के अवतार स्वरूप को देख प्रसन्न हो जाते हैं व कहते हैं जय सच्चिदानन्द जग पावन, अस कहि चले मनोज नसावन, परन्तु उपयुक्त समय ना जान कर सती के साथ चले जा रहे हैं व बार-बार मुड़ कर देखते जाते हैं व कह रहे हैं कि जय हो जगत को पवित्र करने वाले सच्चिदानन्द की जय हो, सती को संदेह होता है व मन ही मन कहतीं हैं कि सारा जगत भगवान शिव की वन्दना करता है व प्रभु एक राजपुत्र को सर नंवा रहे हैं आश्चर्य करती हैं, संदेह करना नारी का स्वभाव होता है शिव जी जान जाते हैं व कहते हैं "जौं तुम्हरें मन अति संदेहू, तौ किन जाइ परीक्षा लेहू" शिव की आग्या पाकर सती परीक्षा लेने जाती हैं व सोचती हैं कि परीक्षा कैसे लूँ? यहाँ शिव जान जातें हैं कि मेरे समझाने पर भी सती का संदेह दूर ना होना सती के लिए कुशल नहीं है, भगवान शिव सोचते हैं होइहि सोइ जो राम रच राखा, को कर तर्क बढ़ावै साखा पति की बात ना मानता एक पत्नी के लिए विनाश का कारण बन सकता है यह नारी स्वभाव वश सती ने नहीं जान पाया, अब सती बार-बार विचार करतीं हैं फिर सीता का रूप रख लेती हैं, परीक्षा वह इस प्रकार जो कि भक्ति के मार्ग में अभिशाप बन जाती है प्रभु राम तो अन्तर्यामी हैं सब जान गये बोलें आप वन में अकेले क्यों, बृषकेतू भगवान शिव कहाँ है, सर्वग्य भगवान राम के समक्ष माया कैसे टिक सकती है, माया को तो वे नटनी की तरह नचाने वाले हैं यहाँ सती व शिव संवाद भारतीय नारियों के लिए एक शिक्षा के तौर पर है कि पति जो परमात्मा तुल्य है उसकी बात पर संदेह करने का परिणाम क्या होता है।
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