हरिद्वार की गूंज
(मनीष लखानी
) अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी डाॅ० शमशेर सिंह बिष्ट के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि डाॅ० शमशेर सिंह बिष्ट सामाजिक सरोकारों के साथ साथ पर्यावरणीय चेतना से भी जुड़े रहे। वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, प्रखर वक्ता और उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का शनिवार को निधन हो गया। वह 69 वर्ष के थे और पिछले 4 वर्षों से शुगर और गुर्दे की तकलीफ के कारण अस्वस्थ चल रहे थे। एम्स में ऑपरेशन के बाद वह घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। डॉ. बिष्ट के चले जाने से राज्य आंदोलनकारी और देश-विदेश के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता स्तब्ध हैं।
डॉ. बिष्ट ने शनिवार तड़के करीब 4 बजे अंतिम सांस ली। डॉ. बिष्ट विश्वविद्यालय आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन, चिपको आंदोलन और उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अगुवा रहे। नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन में वह 40 दिन जेल में रहे। जंगलों की नीलामी के खिलाफ 27 नवंबर 1977 को नैनीताल में हुए प्रदर्शन में वह आगे रहे। इस प्रदर्शन के बाद रहस्यमय तरीके से नैनीताल क्लब जलकर खाक हो गया था। जब पौड़ी में जुझारू पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई तो पौड़ी से लेकर दिल्ली तक शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी का खौफ था और कोई भी उसके खिलाफ बोल नहीं रहा था। ऐेसे में अल्मोड़ा से डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट और रघु तिवारी ने आकर खौफ के सन्नाटे को तोड़ते हुए पौड़ी की सड़कों पर मनमोहन के खिलाफ नारे लगाये और उमेश डोभाल के हत्यारों को पकड़ने के लिये आंदोलन को तेज किया। यह उनका रणनीतिक कौशल ही था कि राज्य आंदोलन की लड़ाई के दौरान अल्मोड़़ा में उन्होने सर्वदलीय संघर्ष समिति के बैनर तले सभी ताकतों को एक मंच पर एकत्रित कर दिया था। उनके साथी रहे वरिष्ठ पत्रकार व आंदोलनकारी पीसी तिवारी ने कहा कि डॉ. बिष्ट के निधन से राज्य ने अपना एक हितैषी खो दिया है। वह एक ऐसी शख्सियत थे, जो कि सत्ता के दमन से कभी नहीं डरे और हमेशा जनता के पक्ष में आवाज बुलंद करते रहे। कहा कि उन्होंने कभी भी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। वह चाहते तो किसी भी राष्ट्रीय पार्टी में शामिल होकर एमपी, एमएएलए बन सकते थे, लेकिन कभी भी विचारों से समझौता नहीं किया। उनकी अंतिम यात्रा उनके निवास स्थान से सुबह 11 बजे शुरू हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शरीक हुए। वहीं उनके निधन से परिवार में कोहराम मचा हुआ है।
(मनीष लखानी
) अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी डाॅ० शमशेर सिंह बिष्ट के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि डाॅ० शमशेर सिंह बिष्ट सामाजिक सरोकारों के साथ साथ पर्यावरणीय चेतना से भी जुड़े रहे। वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, प्रखर वक्ता और उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का शनिवार को निधन हो गया। वह 69 वर्ष के थे और पिछले 4 वर्षों से शुगर और गुर्दे की तकलीफ के कारण अस्वस्थ चल रहे थे। एम्स में ऑपरेशन के बाद वह घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। डॉ. बिष्ट के चले जाने से राज्य आंदोलनकारी और देश-विदेश के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता स्तब्ध हैं।
डॉ. बिष्ट ने शनिवार तड़के करीब 4 बजे अंतिम सांस ली। डॉ. बिष्ट विश्वविद्यालय आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन, चिपको आंदोलन और उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अगुवा रहे। नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन में वह 40 दिन जेल में रहे। जंगलों की नीलामी के खिलाफ 27 नवंबर 1977 को नैनीताल में हुए प्रदर्शन में वह आगे रहे। इस प्रदर्शन के बाद रहस्यमय तरीके से नैनीताल क्लब जलकर खाक हो गया था। जब पौड़ी में जुझारू पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई तो पौड़ी से लेकर दिल्ली तक शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी का खौफ था और कोई भी उसके खिलाफ बोल नहीं रहा था। ऐेसे में अल्मोड़ा से डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट और रघु तिवारी ने आकर खौफ के सन्नाटे को तोड़ते हुए पौड़ी की सड़कों पर मनमोहन के खिलाफ नारे लगाये और उमेश डोभाल के हत्यारों को पकड़ने के लिये आंदोलन को तेज किया। यह उनका रणनीतिक कौशल ही था कि राज्य आंदोलन की लड़ाई के दौरान अल्मोड़़ा में उन्होने सर्वदलीय संघर्ष समिति के बैनर तले सभी ताकतों को एक मंच पर एकत्रित कर दिया था। उनके साथी रहे वरिष्ठ पत्रकार व आंदोलनकारी पीसी तिवारी ने कहा कि डॉ. बिष्ट के निधन से राज्य ने अपना एक हितैषी खो दिया है। वह एक ऐसी शख्सियत थे, जो कि सत्ता के दमन से कभी नहीं डरे और हमेशा जनता के पक्ष में आवाज बुलंद करते रहे। कहा कि उन्होंने कभी भी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। वह चाहते तो किसी भी राष्ट्रीय पार्टी में शामिल होकर एमपी, एमएएलए बन सकते थे, लेकिन कभी भी विचारों से समझौता नहीं किया। उनकी अंतिम यात्रा उनके निवास स्थान से सुबह 11 बजे शुरू हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शरीक हुए। वहीं उनके निधन से परिवार में कोहराम मचा हुआ है।



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