हरिद्वार की गूंज
(गगन शर्मा) हरिद्वार। खुले में शौच करने वालो पर अर्थ दण्ड लगाने से पहले हरिद्वार की पुरानी कचहरी जहाँ वर्तमान में सूचना विभाग का दफ्तर भी है, प्रशासन को शौचालय बनाने पर विचार करना कहि ज्यादा जरूरी है। इसे तो दिये तले अंधेरा ही कहेंगे, कि 50% से भी ज्यादा सरकारी कार्यालय मे वहाँ के अधिकारी शौचालयों का प्रति गम्भीर नही दिखते है। हॉ उनका अपना व्यक्तिगत शौचालय होने के कारण उन्हें जनता की आवश्यकता पर ध्यान देने की कभी जरुरत ही महसूस नही हुई। हाल ही का दूसरा अति गम्भीर मामला BHEL में केशव कुंज का है जहाँ पिछले कई महीनों से CPU कार्यलय स्थान्तरित होना था। यदि पुलिस के आला अधिकारी थोड़ी सी सूझ बूझ से काम लेते तो यहाँ CPU को शिफ्ट करने से पहले ही पानी, प्रकाश व्यवस्था, जंगली जानवरों से सुरक्षा, वर्षा के पानी से सरकारी कागजो को बचाने की व्यवस्था, इससे भी कही ज्यादा जरूरी शौचालय की व्यवस्था हो सकती थी। आला अधिकारियों को लगता है कि जब टेंट लगा कर जंगल मे रहा जा सकता है तो शहर में क्यो नही? सिर्फ सोच और आवश्यकता का फर्क है। जैसे आला अधिकारी मूलभूत सुविधाओं के लिए अपने से बड़े अधिकारियों से अपेक्षा रखते हैं ऐसे ही उनके छोटे अधिकारी भी तो अपेक्षा रखेंगे कि उनकी मूलभूत सुविधाओं को दरकिनार न किया जाय। इस तरह की अव्यवस्थाओ से हरिद्वार के आला अधिकारी जनता और मीडिया को क्या सन्देश देना चाहते हैं? जब तक केशवकुंज के CPU कार्यालय का शौचालय चालू नही होता जिसको चालू होने में 10 दिन लग सकते है। तब तक यदि किसी CPU कर्मचारियों या अधिकारी को लू लगने के कारण पेचिस लग गए तो क्या वो तब तक बोतल /डब्बा उठा कर जान जोखिम में डाल कर जंगल की झाड़ियों में बैठेगा! इस विषय मे हरिद्वार स्वच्छता अभियान के ब्रांड अम्बेसडर दीपक रावत जी से अपेक्षा है कि वो इस विषय पर संघान लेकर त्वरित कार्यवाही करने के लिये आदेश जारी करेंगे।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। खुले में शौच करने वालो पर अर्थ दण्ड लगाने से पहले हरिद्वार की पुरानी कचहरी जहाँ वर्तमान में सूचना विभाग का दफ्तर भी है, प्रशासन को शौचालय बनाने पर विचार करना कहि ज्यादा जरूरी है। इसे तो दिये तले अंधेरा ही कहेंगे, कि 50% से भी ज्यादा सरकारी कार्यालय मे वहाँ के अधिकारी शौचालयों का प्रति गम्भीर नही दिखते है। हॉ उनका अपना व्यक्तिगत शौचालय होने के कारण उन्हें जनता की आवश्यकता पर ध्यान देने की कभी जरुरत ही महसूस नही हुई। हाल ही का दूसरा अति गम्भीर मामला BHEL में केशव कुंज का है जहाँ पिछले कई महीनों से CPU कार्यलय स्थान्तरित होना था। यदि पुलिस के आला अधिकारी थोड़ी सी सूझ बूझ से काम लेते तो यहाँ CPU को शिफ्ट करने से पहले ही पानी, प्रकाश व्यवस्था, जंगली जानवरों से सुरक्षा, वर्षा के पानी से सरकारी कागजो को बचाने की व्यवस्था, इससे भी कही ज्यादा जरूरी शौचालय की व्यवस्था हो सकती थी। आला अधिकारियों को लगता है कि जब टेंट लगा कर जंगल मे रहा जा सकता है तो शहर में क्यो नही? सिर्फ सोच और आवश्यकता का फर्क है। जैसे आला अधिकारी मूलभूत सुविधाओं के लिए अपने से बड़े अधिकारियों से अपेक्षा रखते हैं ऐसे ही उनके छोटे अधिकारी भी तो अपेक्षा रखेंगे कि उनकी मूलभूत सुविधाओं को दरकिनार न किया जाय। इस तरह की अव्यवस्थाओ से हरिद्वार के आला अधिकारी जनता और मीडिया को क्या सन्देश देना चाहते हैं? जब तक केशवकुंज के CPU कार्यालय का शौचालय चालू नही होता जिसको चालू होने में 10 दिन लग सकते है। तब तक यदि किसी CPU कर्मचारियों या अधिकारी को लू लगने के कारण पेचिस लग गए तो क्या वो तब तक बोतल /डब्बा उठा कर जान जोखिम में डाल कर जंगल की झाड़ियों में बैठेगा! इस विषय मे हरिद्वार स्वच्छता अभियान के ब्रांड अम्बेसडर दीपक रावत जी से अपेक्षा है कि वो इस विषय पर संघान लेकर त्वरित कार्यवाही करने के लिये आदेश जारी करेंगे।




Post A Comment:
0 comments so far,add yours