हरिद्वार की गूंज (24*7)
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(नीटू कुमार) हरिद्वार। मानव अधिकार संरक्षण समिति की कनखल नगर अध्यक्षा रेखा नेगी ने कहा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हर साल 8 मार्च को मनाया जाता है, यह उन महिलाओं को मनाने का दिन है जो व्यक्तिगत और व्यावसायिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर दिन कड़ी मेहनत करती हैं, यह एक ऐसा दिन है जब दुनिया भर में एक्टिविस्ट्स, मूवमेंट और मार्च होते हैं, कुछ ऐसे देश हैं जहाँ महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिलते हैं। इन देशों में महिलाओं की भूमिका घरेलू कामों तक ही सीमित है, हालांकि, इसे बदलने की जरूरत है क्योंकि महिलाएं पुरुषों की तरह हर चीज में समान अवसर की हकदार हैं, दुनिया लिंग संतुलन हासिल करने की ओर बढ़ रही है| यह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समानता की ओर बढ़ रहा है, उम्र के लिए, समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के पास अधिक विशेषाधिकार हैं। हालाँकि, इसे बदलने की आवश्यकता है क्योंकि हम सभी मनुष्य हैं, और हम सभी को समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ऐसा दिन है जहाँ हर कोई अपने जीवन में महिलाओं की हर उस चीज़ की सराहना करता है, यह एक ऐसा दिन है जब हर कोई अपने जीवन में महिलाओं के मूल्य और महत्व को स्वीकार करता है- दुनिया में महिलाओं की संख्या बहुत अधिक है। उन्होने कहा जहां तक हमारे देश भारत की बात है, भारत में दो प्रकार की महिलाएं हैं। पहली वें जो जीवन में हर प्रकार से सुखी व सुरक्षित हैं और दूसरी वें जिनका पूरा जीवन शुरू से अंत तक संघर्ष की एक अंतहीन कहानी है। वर्तमान दौर की लड़कियों की बात की जाए तो ये लड़कियां आज बहुत से क्षेत्रों में भागेदारी कर रही हैं। पहले महिलाओं को कमजोर व सीमित माना जाता था लेकिन अब महिलाओं ने अपना महत्वक साबित कर दिखाया है। जो महिलाएं संपन्नो एवं अमीर घरों से संबंध रखती हैं, उनके लिए जीवन एक आनंद की यात्रा है लेकिन गरीब और बेसहारा महिलाएं आज भी जीवन को एक यातना की तरह भुगत रही हैं। निश्चि्त ही देश की सरकार को इस तबके की महिलाओं के लिए गंभीरता से ना केवल विचार करना चाहिये बल्कि उनके लिए कल्या णकारी योजनाएं लाना चाहिये और उनका जीवन सुधारना चाहिये।
उन्होने कहा यदि कोई लड़की गरीब घर की है और केवल पैसों की कमी के चलते वह पढ़ाई नहीं कर सकती है तो समाज व सरकार को उसकी मदद के लिए आगे आना चाहिये। उसकी प्रतिभा का सम्मा न किया जाना चाहिये। कामकाजी महिलाओं के सिर पर दोहरी जिम्मे दारी होती है। उन्हें पढ़ाई भी करना होता है और घर का खर्च भी वहन करना होता है। ऐसी संघर्षरत महिलाओं के लिए अच्छाद समय अभी भी दूर है। शादी के बाद इन महिलाओं का जीवन बदल जाता है। घर की जिम्मे दारियों के बोझ तले वे दब जाती हैं। संतान के जन्मद के बाद उनके दायित्वा बढ़ते जाते हैं। ऐसे में आखिर वे समझौता करने लगती हैं और खुद को प्राथमिकता पर रखना भूल जाती हैं। यह हमारे समाज और सरकारों का सामूहिक दायित्व है कि हम समाज की उपेक्षित, पिछड़ी, बेसहारा, गरीब और अनाथ महिलाओं को आगे बढ़ाएं और उनका जीवन नर्क होने से बचाएं।
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