हरिद्वार की गूंज (24*7)
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(जिला ग्रामीण प्रभारी फिरोज अहमद) लेख। इन दिनों हम हर चीज से उम्मीद बांध रहे हैं हताश निराश और परास्त कर देने वाले इस साल के बाद इसके अलावा और हो भी क्या हो सकता है। शेयर बाजार थोड़ा चढ़ता है तो ना जाने क्यों एक उम्मीद जागती है। बेरोजगारी डर में अति मामूली गिरावट भी ढेर सारी आशा का संचार करने लगती है। मुद्रास्फीति जब बढ़ती है तब उसके भी कई सकारात्मक विश्लेषण होने लगते हैं और महंगाई घटती है तो उसके खैर कहने की क्या हरदम यही इंतजार रहता है कि इस बार विकास दर के आंकड़े कम से कम पहले जितने तो बुरे नहीं ही होंगे। किसी क्षेत्र में कुछ होता है तो चर्चा होने लगती है कि अब नए अंकुर फूट रहे हैं हम खुश होते हैं यह जानते हुए की हरियाली अभी बहुत दूर है। जल्द से जल्द हम सब महामारी से पहले के उस दौर में लौट जाना चाहते हैं तब जिसकी आलोचना करते हुए भी हम नहीं थकते थे। इन्हीं सब में वह किसान भी शामिल हैं जो दिल्ली की सीमाओं पर 2 महीने से भी अधिक वक्त से धरने पर बैठे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसी माहौल में आज अगले वित्त का जो बजट पेश करेगी उसी के लिए भी हमारे पास उम्मीद बांधने के अलावा और कुछ नहीं है। यह जानते हुए कि किस आर्थिक आधार पर खड़े होकर देश का सालाना बजट तैयार होता है वह इस समय काफी कमजोर है। महामारी और लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था जिस तरह से गोते खा चुकी है। उसे यहां दोहराने की कोई जरूरत नहीं है बात सिर्फ इतनी है कि सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी के तेजी से गिरने के कारण सरकार का राजस्व भी काफी गिर चुका है। खर्च की उम्मीद तो रुपयों से भी ज्यादा बांधी जा रही है। पर आमदनी आठवी रह गई है। ऐसे में यह तय है कि वित्त मंत्री के लिए सब की उम्मीद पर खरा उतरना संभव नहीं होगा कुछ खर्चे हैं जिन्हें आप कम नहीं कर सकते मसलन सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सरकारी तंत्र के तमाम दूसरे खर्च मुद्रास्फीति के हिसाब से इनमें बढ़ोतरी ही होनी है। इसी तरह रक्षा खर्च है जिसे भी आप कम नहीं कर सकते चीन के साथ सीमा पर जिस तरह के तनाव है उसे देखते हुए इसे बढ़ाना भी पड़ सकता है वैसे कम तो आप किसी भी खर्च को नहीं कर सकते ना शिक्षा के खर्च को, ना स्वास्थ्य के खर्च को। पिछले साल किसान सम्मान निधि के लिए प्रावधान करने के बावजूद बजट में कृषि पर होने वाले खर्च को थोड़ा सा कम किया गया था। लेकिन इस बार जिस तरह से किसानों की नाराजगी दिख रही है उसमें यह भी शायद बहुत ज्यादा संभव नहीं होगा। बल्कि यह भी हो सकता है कि सरकार को किसान हितेषी दिखाने के लिए वित्त मंत्री को इसमें कुछ बढ़ोतरी ही करनी पड़े यह भी मुमकिन है कि सरकार की आमदनी में कमी करनी पड़ सकती है। मल सन मध्यवर्ग को करो में कुछ राहत देकर यह माना जाता है कि ना किसान और ना उद्योगपति अनंत मध्यवर्ग की जिजीविषा ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकती है और यही वह वर्ग है जो भारतीय जनता पार्टी भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक रहा है और उसके शासनकाल में सबसे कम उसी को मिला है। नोटबंदी से जीएसटी तक का सारा भार भी मुख्य रूप से उसी के सिर पर पड़ा है परिभाषा यह बताती है कि बजट और कुछ नहीं इन्हीं आमदनी और खर्चों का खातो मैं संतुलन बिठाना बाहर है। लेकिन किसी भी देश का बजट व्यवहार में सिर्फ इतना नहीं होता उसमें देश की उम्मीद हसरतों और जरूरतों को जगह देनी होती है। यानी वह सारी चीजें जो सत्ताधारी दल के पूर्वाग्रह उसकी विचारधारा और उसकी राजनीति को आकार देती है। यही वह जगह है जहां किसी भी बजट में आमदनी और खर्च के खातों का संतुलन एक छोटी चीज रह जाता है और उसकी राजनीति बड़ी हो जाती है कुछ ज्यादा ही बड़ी यह भी कहा जाता है कि बजट सिर्फ बजट नहीं होता यह सरकार की प्राथमिकताओं का एक दस्तावेज भी होता है। दूसरी तरफ यह भी माना जाता है कि बजट सरकार के लिए पब्लिक रिलेशन यानी जनसंपर्क का एक मौका बनकर आता है पहले दिन बजट का जो रूप हमारे सामने आता है वह वित्त मंत्री का सदन में दिया गया भाषण होता है। जो आमतौर पर लोक लुभावने नारों और वादों से भरपूर होता है बहुत सारी चीजें जिनका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका होती है उन्हें अक्सर इस से गायब कर दिया जाता है। बजट का यह पब्लिक रिलेशन वाला रोग हमेशा से ही रहा है पहले यह बजट के भाग दो में क्या सस्ता हुआ क्या महगा के रूप मे सामने आता है। और अगले दिन अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जंग है पता था जीएसटी आने के बाद से ये चीजें बदल गई हैं लेकिन बजट के जरिए जनसंपर्क के रास्ते बंद नहीं हुए बजट भाषण में अक्सर ऐसी घोषणाएं भी की जाती है या ऐसी नीतियां भी गिन गिनवाई जाती है जिनका सीधे तौर पर बचत से कोई लेना देना नहीं होता। कुछ दिनों पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि पिछली एक सदी में यह पहला मौका है जब बजट तैयार करने का काम महामारी के साए में हो रहा है जाहिर है वित्त मंत्री के पास पिछली एक सदी का सबसे महत्वपूर्ण बजट पेश करने का भी मौका है लेकिन क्या वह इस अवसर का फायदा उठा सकेंगे उसकी उम्मीद तो हमें बांधनी ही होगी।
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