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1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू होने के बाद नए कानून में यह तय किया गया कि साल 2022 तक राज्यों को राजस्व का जो भी नुकसान होगा, उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी। गुड्स एंड सर्विसेस (कम्पेनसेशन टू स्टेट्स) अधिनियम 2017 के तहत केंद्र का राज्यों को मुआवज़ा देना अनिवार्य है। इस नियम के तहत केंद्र को राज्यों को उनका मुआवजा देना होता है, नए नियम बनने के बाद आधार वर्ष 2015-16 को मानते हुए यह तय किया गया कि राज्यों के इस प्रोटेक्टेड रेवेन्यू में हर साल 14 फीसदी की बढ़त को मानते हुए गणना की जाएगी। केंद्र की तरफ से कहा गया कि राज्यों को मिलने वाला सभी मुआवजा जीएसटी के कम्पेनसेशन फंड से दिया जाएगा।
केंद्र और राज्य सरकारों चालू वित्त वर्ष के दौरान माल एवं सेवाकर राजस्व में होने वाले करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई को लेकर एक दूसरे के आमने सामने हैं, केंद्र के कैलकुलेशन के हिसाब से इस राशि में से करीब 97,000 करोड़ रुपये की ही राशि है जिसका नुकसान जीएसटी पर अमल की वजह से होगा जबकि शेष 1.38 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान कोविड-19 के प्रभाव की वजह से होगा। राज्य और केंद्र सरकार के बीच मुआवजे को लेकर तो उलझन चल ही रही है, लेकिन इस जीएसटी लागू होने के बाद ऑनलाइन सिस्टम को आम जनता और कारोबारियों का न समझ पाना. वहीं बार बार टैक्स दरों में बदलाव से भी कारोबारी और लोग काफी परेशान हुए है, पेट्रोल-डीजल को अबतक जीएसटी के दायरे से बाहर रखना और जीएसटी बिल के फर्जीवाड़े ने भी खूब समस्या खड़ी की है। जीएसटी एक्ट का सेक्शन 10(1) इस बात की इजाजत देता है कि टैक्स संग्रह की अन्य राशि में से भी राज्यों को मुआवजा दिया जा सकता है। लेकिन वित्त मंत्री के उधार लेने की बात के बाद भी गैर बीजेपी शासित राज्य अपनी सहमति नहीं जता रहे लिहाजा 41वी फिर 42वीं और अब नूतन वर्ष में उम्मीद की जा रही है कुछ हल निकल कर आए।



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