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(यतेंद्र कुमार) हरिद्वार। मानव अधिकार संरक्षण समिति के राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री हेमन्त सिंह नेगी ने महर्षि वाल्मीकि जयंती के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वाल्मीकि जयंती हिंदू कैलेंडर के आश्विन महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह सितंबर-अक्टूबर के महीने में आता है। वाल्मीकि जी के जीवन से हमें बहुत सीखने को मिलता हैं, उनका व्यक्तित्व साधारण नहीं था। उन्होंने अपने जीवन की एक घटना से प्रेरित होकर अपना जीवन पथ बदल दिया, जिसके फलस्वरूप वे महान पूज्यनीय कवियों में से एक बने। यही चरित्र उन्हें महान बनाता हैं और हमें उनसे सीखने के प्रति प्रेरित करता हैं। वाल्मीकि एक डाकू थे और भील जाति में उनका पालन पोषण हुआ, लेकिन वे भील जाति के नहीं थे, वास्तव में वाल्मीकि जी प्रचेता के पुत्र थे। पुराणों के अनुसार प्रचेता ब्रह्मा जी के पुत्र थे। बचपन में एक भीलनी ने वाल्मीकि को चुरा लिया था, जिस कारण उनका पालन पोषण भील समाज में हुआ और वे डाकू बने। अपने प्रारंभिक जीवन में वह रत्नाकर नाम का एक डाकू थे, जो लोगों को मारने और उन्हें लूटने के लिए उपयोग करते थे। एक दिन उनके जंगल से नारद मुनि निकल रहे थे। उन्हें देख रत्नाकर ने उन्हें बंधी बना लिया। नारद मुनि ने उनसे सवाल किया कि तुम ऐसे पाप क्यूँ कर रहे हो? रत्नाकर ने जवाब दिया अपने एवम परिवार के जीवनव्यापन के लिए। तब नारद मुनि ने पूछा जिस परिवार के लिए तुम ये पाप कर रहे हो, क्या वह परिवार तुम्हारे पापो के फल का भी वहन करेगा ? इस पर रत्नाकर ने जोश के साथ कहा हाँ बिल्कुल करेगा। मेरा परिवार सदैव मेरे साथ खड़ा रहेगा। नारद मुनि ने कहा एक बार उनसे पूछ लो, अगर वे हाँ कहेंगे तो मैं तुम्हे अपना सारा धन दे दूंगा। रत्नाकर ने अपने सभी परिवार जनों एवं मित्र जनों से पूछा, लेकिन किसी ने भी इस बात की हामी नहीं भरी। इस बात का रत्नाकर पर गहरा आघात पहुँचा। तब रत्नाकर ने जीवन की सच्चाई को समझा और ऋषि से क्षमा मांगी। नारद ने मोक्ष के लिए रत्नाकर को मंत्र सिखाया। मंत्र में भगवान राम का नाम था और इसका उपयोग उनके जैसे हत्यारों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए नारद ने रत्नाकर से कहा कि वे "राम" के बजाय "मरा" का जप करें। महर्षि वाल्मिकी के नाम के विषय में भी कहा जाता है कि एक बार महर्षि वाल्मिकी ध्यान में मग्न थे। तब उनके पूरे शरीर को दीमको ने घर लिया था। जब महर्षि की साधना पूर्ण होने के बाद उनका ध्यान टूटा तो वे दीमक को हटा कर बाहर निकले। दीमको के घर को वाल्मिकी कहा जाता है। इसी के कारण उनका नाम वाल्मिकी हुआ। इनकी महान रचना से हमें महा ग्रन्थ रामायण का सुख मिला। यह एक ऐसा ग्रन्थ हैं जिसने मर्यादा, सत्य, प्रेम, भातृत्व, मित्रत्व एवं सेवक के धर्म की परिभाषा सिखाई।



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