हरिद्वार की गूंज (24*7)
(इमरान देशभक्त) रुड़की। अल्लाहुताला हजरत इमाम हुसैन रजि. पैगंबर हजरत मोहम्मद सल.के नवासे थे और इमाम भी थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बाद इमामे हसन हजरत अली के उत्तराधिकारी बनाए गए। इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए उन्होंने अपनी शहादत पेश की। उस समय जालिम ताकतें हर तरह से जुल्म करने पर आमादा थीं। वह पूरे अरब मुल्क में नरसंहार करके आतंक फैलाना चाहती थी। इमामे हसन ने इंसानियत का खून ना बहे, अमीरे शाम (सीरिया) से सुलाह की और सुलाह में यह शर्त रखी कि जो भी हुकूमत करेगा, उसकी हुकूमत इस्लामी होगी। किसी को नाजायज परेशान या मारा नहीं जाएगा, सारी जनता को इंसाफ दिया जाएगा। शासकीय धन गरीबों, असहायों और जरूरतमंदों पर खर्च किया जाएगा। हर तरफ अमन-शांति रहेगी, मेरे बाद हकूमत मेरे भाई इमामे हुसैन को वापस कर दी जाएगी। इस बात को अमिरे शाम मान ली,किंतु उसने कुछ दिनों बाद उस सुलह पर अमल न करके हजरत इमामे हसन को 28 सफ्र 50 हिजरी को जहर देकर शहीद करा दिया। उनके बाद इमामे हुसैन को हकूमत वापस ना करके अपने बेटे यजीद को शाम(सीरिया)का शासक बना दिया। इमामे हसन के बाद हजरत इमाम हुसैन ने इमामत का औहदा संभाला,तब जालिम यजीद शराब व ताकत के नशे में आतंक फैला कर इस्लाम व इंसानियत का दुश्मन बन बैठा। वह इस्लामी कानून, कुराने पाक और अल्लाह तथा उनके प्यारे रसूल सल. के बताए हुए कानून को अस्वीकार कर मनमाने ढंग से राज करने पर आमादा था, लेकिन इधर इस्लाम को बचाने के लिए इमामे हुसैन और चंद सहाबा इकराम मौजूद थे, जो उस समय इस्लाम और इंसानियत की रक्षा कर रहे थे। जालिम यजीद आदम अलैहिस्सलाम से लेकर मोहम्मद सल. तक इस्लाम के लिए जो मेहनत हुई थी, उसको मिटा देना चाहता था, इसलिए मोहम्मद सल. के नवासे इमामे हुसैन ने जालिम यजीद की बेयत से इंकार कर दिया।बेयत का अर्थ है इस्लाम बेचना। जालिम यजीद जानता था कि हजरत मुहम्मद सल. के वारिस हुसैन हैं अगर वह मेरी बात मान लेते हैं तो हमारा विरोध करने वाला अब कोई ना रहेगा, हम अपनी ताकत के बल पर पूरे अरब को दबा लेंगे। इसलिए जालिम यजीद हर कोशिश करके इमामे हुसैन से अपनी तमाम बातों को मनवाना चाहता था। जब जालिम यजीद की बेयत लेने से इमामे हुसैन ने मना कर दिया तो जालिम यजीद ने अपने गवर्नर वलीद को मदीने में खत भेजा कि हुसैन से बेयत ले लो या हुसैन से कहो कि मदीना छोड़ दे। जब इमामे हुसैन के सामने जालिम यजीद का खत रखा गया तो इमामे हुसैन ने कहा कि मैं मदीना तो छोड़ सकता हूं लेकिन जालिम यजीद से बेयत नहीं कर सकता। इस प्रकार जब यजीद ने इमामे हुसैन को मजबूर कर दिया तब उन्होंने अपने पूरे घराने को साथ लेकर 28 रजब सन 60 हिजरी को मदीने से कर्बला का रुख किया, कोई भी इंसान अपना वतन आसानी से नहीं छोड़ सकता। इमामे हुसैन ने अपने नाना जान रसूले खुदा, मां फातिमा जहरा और भाई इमामे हसन की कब्र से रो-रो कर जुदा हुए व गले मिलकर आपस में बहुत रोए और फिर उनका काफिला कर्बला की तरफ रवाना हुआ। कई दिन तक सफर करने के बाद वह काफिले के साथ भूखे प्यासे थे, किंतु जालिम यजीद की फौज उनका पीछा कर रही थी।जालिम यजीद ने इमामे हुसैन के काफिले में शामिल बच्चों, औरतों और उन पर हमला कर दिया, जिसमें वह कई दिनों तक लड़ते-लड़ते भूखे-प्यासे शहीद हो गए। इस गम के दिनों में हमें उनकी कुर्बानी को याद कर गरीबों व असहायों की सेवा करनी चाहिए तथा रोजा रखना चाहिए।



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