हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। आधुनिकता के इस युग मे जहां व्यक्ति का व्यवहार एवं जीवन शैली बिना किसी सैद्वान्तिक आधार के आभाव में केवल चकाचैंध एवं आकर्षण के कारण भ्रमित होकर दिशाहीन आगे बढती जा रही है। यहां सम्बंधों का आधार स्वार्थ एवं क्षणिक सुख पर केन्द्रित है। जहां जन्म देने वाले माता-पिता वृद्वाश्रम में असहाय एवं दुखी होकर जीवन व्यतीत करने को मजबूर है वही लाखों अनाथ बच्चे बेहतर तालिम एवं सहारे के लिए एक काल्पनिक जीवन एवं आशा भरी खुली आंख से सपना देख रहे है। ऐसे बदले परिदृश्य मे व्यक्ति से मर्यादित जीवन की कल्पना केवल स्वप्न मात्र लगती है। इतनी सब विषमताओें के बीच जिंदगी निराश एवं हताश नही लगती। ऐसी दशा मे आज भी आशा की एक किरण रामराज्य की संकल्पना को साकार कर सकती है और वह है आस्था एवं मर्यादा।

हिन्दुस्तान की भूमि अध्यात्म एवं महापुरूषों की जननी है। इस भूमि पर प्रत्येक युग में किसी न किसी महापुरूष, धर्म प्रवर्तक का अवतरण सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के निमित्त हुआ है। ऐसे परम पुरूषों के जीवन मे आदर्शो का स्थान सदैव ऊॅचा रहा है। आदर्श और मर्यादाओं का पालन करने के लिए भारतवासीयों के चित्त में पुरूषोतम भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र स्मरण होता है। जिनका जीवन आदर्शो एवं मर्यादाओं से परिपूर्ण है। भगवान श्रीराम ने अपने जीवन मे कभी कोई उपदेश नही दिया और न ही स्वयं किसी ग्रन्थ की रचना की। उन्होने जीवन के मूल सिद्वान्तों को स्वयं जीया एवं दूसरो के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया। रामायण कथा के प्रसंग में राजतिलक की तैयारियों के बीच जब काल चक्र की गति बदली और क्षणभर मे राजतिलक चैदह वर्ष के वनवास में परिवर्तित हुआ। जीवन का इतना बढा परिवर्तन होने पर भी श्रीराम क्षणभर के लिए भी असहज नही हुए और न ही उनके मन मे इस कारणवंश माता कैकेयी के सम्मान में कोई कमी आई। कुछ समय के लिए लक्ष्मण अवश्य क्षुब्ध हुए परन्तु राम ने लक्ष्मण को भावनाओं से ऊपर उठकर कर्तव्य पालन की सीख देकर शान्त किया। श्रीराम का जीवन दर्शन पग पग पर मर्यादाओं से कभी अलग नही हुआ। वनवास घोषणा प्रसंग में भरत द्वारा अपनी माता कैकेयी के सम्पूर्ण कुचक्र को जानने के बाद माता के रूप में त्याग कर देने के बाद हुए अहसास से जब कैकेयी व्यथित होने लगी तो चित्रकूट मे राम को वनवास त्यागकर अयोध्या वापस आने के आग्रह पर राम ने कैकेयी से कहाॅ कि यदि माता का आदेश है तो राम इसी क्षण वनवास त्यागकर अयोध्या वापस लौट जायेगा, परन्तु अपने कर्तव्य को पूरा न कर पाने तथा  पूर्वजों की छवि को धूमिल करने से मिलने वाले अपयश को राम सहन नही कर सकेगा। जिसके कारण जीवित होने पर भी राम मृत्यु के समान होगा। क्या आप अपने पुत्र के लिए ऐसा चाहेगी। इस पर कैकेयी ने पुत्र को इस अपयश का भागीदार न बनाकर स्वयं को पश्चाताप की अग्नि मे चलाना बेहतर समझा। यह प्रसंग व्यक्ति को अपने अथवा परिवार के व्यक्तिगत हित से वचन पालन एवं कर्तव्यनिष्ठ को अधिक महत्व प्रदान करता है। और जनमानस को कर्तव्य पालन की सीख देता है।    

पुरूषोत्तम श्रीराम के जीवन प्रसंगों के माध्यम से एक साधारण व्यक्ति भी जीवन की कठिनाईयों को आदर्श एवं मर्यादित व्यवहार का आचरण करते हुए सुनियोजित ढंग से समाधान प्रदाप्त कर सकता है। श्रीराम का सम्पूण जीवन व्यक्ति को सदैव हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने की उत्तम शिक्षा प्रदान करता है। श्रीराम का जीवन चरित्र प्रत्येक युग में मर्यादित एवं बेहतर जीवन की आधारशिला तैयार करने का सशक्त माध्यम है।
Share To:

Post A Comment:

0 comments so far,add yours