हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। व्यक्ति के जीवन मे संबधों का अपना अटूट महत्व होता है। ये बंधन व्यक्ति के मर्यादीत व्यवहार की नीव तैयार करते है। जिसके आधार पर व्यक्ति जीवन मे भाव तथा चुनौतियों का सामना करता है और समाज के समक्ष रिश्तों की एक मिसाल कायम करता है। यह शिक्षा समाज के अन्य लोग प्रेरित करती है। और जैसे जैसे लोग इसका अनुसरण करते जाते है। समाज मे यह प्रचलित होता है। और अन्तोगत्वा यह एक सामाजिक प्रतिष्ठा से जुडा त्यौहर बन जाता है। भाई और बहन के इसी भाव की याद दिलाता है, नाग पंचमी पर्व। हिन्दु त्यौहार तथा पर्वो में भाई-बहन से जुडे अनेक पर्व है जिनमे रक्षा बंधन, तथा भाई-दूज अधिक प्रचलित है। भाई-बहन के उसी पवित्र रिश्तें के भाव से जुडा है नाग पंचमी का दिवस। नाग पंचमी से जुडी पौराणि कथा का सार भाई-बहन के इसी रिश्तें के महत्व की ओर ईशारा करता है। समाज मे नाग को श्रावण मास मे भगवान आशुतोष-शिव के गले के हार के रूप में उनका प्रियगण होने के रूप में पूजा जाता है। और शिवालयों मे नाग देवता को दूध तथा जल अर्पण करके श्रद्वाभाव से नमन किया जाता है, वही इसी पौराणिक दिन के महत्व को भाई-बहन के प्रति श्रद्वा तथा प्रेम के रूप में भी महत्व प्रदान किया गया है, 

पौराणिक कथा
एक घर की बड़ी बहू घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए घर की अन्य  बहुओं को साथ चलने को कहती है। मिट्टी खोदने पर वहां एक सर्प निकलता है जिसे एक बहू खुरपी से मारने लगती है। यह देखकर दूसरी छोटी बहू उसे रोकते हुए कहती है  इसे मत मारो यह बेचारा निरपराध है। यह सुनकर बड़ी बहू सर्प को छोड देती है। तब सर्प एक ओर जाकर बैठता जाता है। तब छोटी बहू ने सर्प से कहा हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और घर पर कामकाज में फंसकर गई। उसे सर्प से किया वादा याद नही रहा। दूसरे दिन उस बहू को वह बात याद आई तब वह सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- तू मुझे भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता। वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूँ, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, मांग ले। वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।
कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि मेरी बहन को भेज दो। सबने कहा कि इसका कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था। उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना। तब उसने सर्प के कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई, वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई। एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुख जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर वह शांत हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया। इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने उससे ईष्र्या से कहा- तेरा भाई बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने उससे कहा कि  झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी। सर्प ने छोटी बहू को हीरे-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। जिसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए। राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया। छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी। यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूंगा। छोटी बहू बोली- राजन, धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया। यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी वह अपने हार सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईष्र्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी। तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं। इस पौराणिक कथा के भाव के कारण ही भाई-बहन के अटूट रिश्तें की आधार शिला है, यह नाग पंचमी का पर्व।
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