हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। व्यक्ति के जीवन मे शरीर तथा मन का अनोखा सम्बंध है। मांसपेशियों तथा हडिडयों के माध्यम से स्थूल तथा मजबूत आकृति का नाम शरीर है। जिसमे विभिन्न सिस्टम तथा सहयोगी अंगों की क्रियाये संचालित होती है अर्थात शरीर इन विभिन्न सिस्टम के लिए एक आवरण अथवा सुरक्षा कवच का कार्य करता है। जबकि मन तंत्रिकाओं एवं संवेदनाओं का एक ऐसा नेटवर्क होता है जो अनुभव के आधार पर शरीर तथा विभिन्न सिस्टम को क्रियाशील बनाए रखता है। मन की गति तथा सिग्नल के आधार पर पूरा शरीर तथा अंग अपना-अपना कार्यो करते है। इन कार्यो की पूर्ति कभी मन को सन्तुष्ट और कभी असन्तुष्ट करती रहती है। मन के सन्तुष्ट होने की स्थिति शरीर में सन्तुलन तथा असन्तुष्ट रहने की स्थिति असन्तुलन उत्पन्न करती है। सन्तुलन-असन्तुलन के बीच शरीर की जैव-रायायनिक प्रक्रिया द्वारा एन्जाईम तथा हार्मोन्स का स्रावण होता है और शरीर की रायायनिक प्रक्रिया पूर्ण होती है। एन्जाईम तथा हार्मोन्स के स्रावण की मात्रा का सीधा सम्बंध व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पडता है। जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य सबसे अधिक प्रभावित होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रभाव पडता है। रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होने पर शरीर अक्सर बीमारियों का घर बना रहता है। गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ0 शिव कुमार चैहान ग्वालियर में मानसिक विकारों पर शोध करने वाली एक संस्था द्वारा आयोजित दो दिवसीय वर्चुअल कान्फ्रेंस के उदघाटन सत्र मे कहाॅ कि मानसिक सन्तुलन से सकारात्मक चिन्तन बढता है जो विपरीत परिस्थितियों मे मन को दूषित विचारों के प्रभाव से बचाता है। ये दूषित विचार शारीरिक क्रियाशीलता को कम करके मानसिक अन्र्तद्वन्द तथा संवेदनात्मक उददीपन(इमोशनल स्टीमूलस) को बढाते है। जो शारीरिक बीमारियों का एक प्रमुख कारण है। इसलिए शारीरिक बीमारियों से बचाव करते समय मानसिक सन्तुलन को भी महत्व दिया जाना जरूरी है, ताकि शारीरिक बीमारियों के कारण को प्रभावित करते हुए भविष्य की बीमारियों की संभावनाओं को कम किया जा सके।



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