हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। देवसंस्कृति विवि में नवरात्र के अवसर पर आयोजित गीतामृत की स्वाध्याय शृंखला के अंतर्गत ब्रह्म को परिभाषित करते हुए कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि संतुलन, सामंजस्य, एकता और अखंडता ही ब्रह्म का अर्थ है। उन्होंने कहा कि हम सबके जुड़ाव का अर्थ ही ब्रह्म है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि व्यक्ति मात्र अपने बारे में सोचता है। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति जाति से ब्राह्मण नहीं होता बल्कि ब्रह्मण वही है जिसे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो। युवा चेतना के उद्घोषक कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने रामचरित मानस का उल्लेख करते कहा कि जिस तरह गुलर के फल में से अनेक बीज निकलते हैं, 
उसी तरह यज्ञीय प्रक्रिया भी ब्रह्ममय है। जो ब्राह्मी चेतना से ओत प्रोत है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में भोजन से पूर्व ब्रह्म को अर्पण करने की प्रार्थना के बाद उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने का विधान है। कुलधिपति ने कहा कि ब्रह्म को जानने वाले हर कोई ब्राह्मण है। उन्होंने यज्ञ विज्ञान का विधान पर विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से विस्तृत जानकारी दी, इससे पूर्व शांतिकुंज के उद्गाताओं ने ‘हर मुख से निकले गायत्री माँ, घर-घर यज्ञ रचायें.....’ संगीत प्रस्तुत दी। इस अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री बलदाऊ देवांगन, विभागों के विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, स्वयंसेवी कार्यकर्त्ता, छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
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