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(रजत चौहान) हरिद्वार। देव संस्कृति विश्व विद्यालय शांतिकुंज के मृत्युंजय सभागार में विशेष ध्यान की कक्षा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने ‘मैं यह नहीं हूँ’ विषय पर विद्यार्थियों को ध्यान में गोता लगवाया, जिसमें व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराया गया। साथ ही उन्होंने ध्यान की प्रक्रिया,, अनुशासन, लाभ आदि पर भी विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि आज मनुष्य अपनी पहचान अपने नाम, मकान नंबर आदि भौतिक चीजों से बताता है, परन्तु मनुष्य की वास्तविक पहचान यह नहीं है। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी आत्मा है। उन्होंने कहा कि संसार की समस्त चर-अचर वस्तु नश्वर है, परन्तु आत्मा अमर है। प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा ही समस्त सृष्टि का विस्तार है। आत्मज्ञान के द्वारा मनुष्य ने अपने वास्तविक रूप को पहचानना चाहिए। उन्होंने कहा कि आसक्ति व अहंकार, मनुष्य को स्वयं की पहचान कराने से विचलित करता है। इन दोनों के न रहने पर ही मनुष्य अपने आपको पहचान सकेगा। आज लोगों ने अपने चेहरे पर कई सारे मुखौटे लगा रखे हैं, जिससे उसका वास्तविक रूप प्रदर्शित नहीं हो पाता है। अतः बाहरी मुखौटे को हटाकर अपने अन्दर देखना चाहिए एवं अपने मूल स्वरूप को पहचानना चाहिए। आज के समय में व्यक्ति की सोच को बताते हुए कुलाधिपति ने कहा कि आज मनुष्य केवल ‘मैं’ तक सीमित हो गया है। ‘मैं’ की भावना त्यागकर सभी को ‘हम’ की भावना पैदा करनी चाहिए। अपने परिवार तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज और देश के लिए भी कुछ कार्य करने चाहिए। कुलाधिपति ने कहा कि व्यक्ति का अंतरंग ही ब्रह्म है और इस ब्रह्म के स्वरूप को पहचानकर अपने जीवन को अच्छे कार्य में लगाना चाहिए। इससे पूर्व सितार, बांसुरी की सुमधुर धुन के साथ कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने ओम नमः नमो ओंकार...... भावपूर्ण गीत गाया। इस दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव बलदाऊ देवांगन, समस्त विभागाध्यक्ष, प्राध्यापकगण, छात्र-छात्राएँ एवं शान्तिकुंज कार्यकर्ता मौजूद रहे।



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